प्रतापगढ़ का अनोखा इतिहास
प्रतापगढ़ की गौरवशाली एवं वैभवशाली गाथा
प्रतापगढ़ इतिहास: प्रतापगढ़ का इतिहास गंगा यमुनी तहजीब हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख, जैन एवं क्रिश्चन सर्ब धर्म सांप्रदायिक सदभाव, आध्यात्मिक, वैदिक, पौराणिक, शिक्षा, संस्कृति, संगीत, कला, सुन्दर भवन, धार्मिक, मंदिर, मस्जिद, ऐतिहासिक दुर्ग, गौरवशाली सांस्कृतिक कला की प्राचीन धरोहर को आदिकाल से अब तक अपने आप में समेटे हुए प्रतापगढ़ (अवध) का विशेष इतिहास रहा है। परिवर्तन के शाश्वत नियम के अनेक प्राकृतिक, राजनैतिक, आर्थिक झंझावतों के बावजूद प्रतापगढ़ का अस्तित्व अदभुत, अलौकिक, अकल्पनीय, अविश्वसनीय एवं अतुलनीय रहा है।
Pratapgarh ki Bhasha
प्रतापगढ़ की भाषा: हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृति, उर्दू , अवधी, भोजपुरी, प्रतापगढ़ी आदि प्रतापगढ़ की मुख्य भाषा है। प्रतापगढ़ की शासकीय भाषा हिंदी है। प्रतापगढ़ जनपद के बोलचाल की लोकप्रिय भाषा अवधी अपने आप में हिंदुस्तान की सभी लिखित अलिखित/ मौखिक भाषा एवं बोलियों को अपने आप में समाये हुए संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में अपना विशेष महत्व रखती है। उदहारण के लिए विश्व स्तरीय महाकाब्य रामचरित मानस तुलसीदास ने अवधी में ही लिखा है। प्रतापगढ़ की कथा:-
प्रतापगढ़ का गौरव
प्रतापगढ़ का इतिहास: प्रतापगढ़ भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के 72 वां जिले के रूप में जाना जाता है। इसे लोग बेल्हा भी कहते हैं क्योकि यहाँ बेल्हा देवी मंदिर है जो कि सई नदी के किनारे बसा है। यह जिला एतिहासिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। एक स्थानीय राजा, सोमवंशी राजपूत राजा प्रताप बहादुर, जिनका कार्यकाल सन् 1628 से 1682 के बीच में था, उन्होंने अपना मुख्यालय रामपुर के निकट एक पुराने कस्बे अरोर में स्थापित किया, जहाँ उन्होंने एक किले का निर्माण किया और अपने ही नाम पर उसका नाम प्रतापगढ़ (प्रताप का किला) रखा। जब 1858 में जिले का पुनर्गठन किया गया तब इसका मुख्यालय बेल्हा में स्थापित किया गया जो अब बेल्हा- प्रतापगढ़ से विख्यात हैं।
प्रतापगढ़ का अनछुआ इतिहास 2024
प्रतापगढ़ का सम्पूर्ण इतिहास Complete History of Pratapgarh @ pratapgarh.nic.in
प्रतापगढ़ का प्राचीन इतिहास
प्रतापगढ़ प्रागैतिहासिक काल से ही काफी अहम भूमिका में रहा है। पौराणिक मान्यताएं से प्रतापगढ़ का समबन्ध रामायण और महाभारत के विभिन्न कथानकों से जोड़त है किन्तु प्राचीन काल से देखने पर इस जनपद का इतिहास मानव जीवन की शैशवावस्था से जुड़ा दिखाई देता है। जब हम असभ्य, खानाबदोश तथा आखेट के सहारे जीवन यापन कर रहे थे।
Itihas Pratapgarh
पुरातात्विक अवशेषणो से हमें पता चलता है कि उच्च पुरापाषाणिक संस्कृति जनपद की प्राचीनतम संस्कृति है। इस संस्कृति के प्रमाण सुलेमान पर्वतपुर ,मंदिर और साल्हीपुर से पत्थर के औजार प्राप्त हुये हैं। इस संस्कृति को वेदों में लगभग 1700 ईo पूo के आसपास माना जाता है।
प्रतापगढ़ का मध्यकालीन इतिहास
प्रतापगढ़ जनपद के सर्वाधिक पुरास्थल लगभग 200 की संख्या में इसी संस्कृति से है। जिनमें से तीन सराय नहर राय , मसीहा तथा दमदमा का उत्खनन भी किया गया है। जहां से बड़ी संख्या में मानव कंकाल, पत्थर के औजार मिले हैं।
प्रतापगढ़ का आधुनिक इतिहास
Pratapgarh ki Khoj
प्रारम्भिक संस्कृति में इस जनपद का कोई भी स्थल प्रकाश में नहीं आया, परन्तु इसके बाद की संस्कृति ताम्र पाषाणिक (तांबे के औजार) से जुड़े लगभग 30 पुरास्थल पट्टी तहसील से प्रकाश में आये हैं। जिनमें भांटी, भेवनी, गंगेहटी, कंजाखास, पूरे देवजानी, सराय, समुद्री आदि हैं। रानीगंज तहसील से चौहरजन नामक स्थान से भी इस संस्कृति के पात्र की परम्परा प्राप्त हुई है।
Pratapgarh ka Map
वीरगाथा काल प्रतापगढ़
आल्हा ऊदल और प्रतापगढ़
माँ वाराही देवी धाम प्रतापगढ़: माँ वाराही देवी का धाम प्रतापगढ़ जनपद के रानीगंज तहसील के उत्तर दिशा में 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। मान्यता है की इस मंदिर की स्थापना 12वीं सदी में दो वीर भाइयों ने की थी जिनका नाम आल्हा और ऊदल था। अनेक लड़ाइयों में विजय प्राप्ति के लिए आल्हा ऊदल ने यहाँ पर वाराही देवी की स्तुति की थी। मंदिर के साथ ही आल्हा ने एक कुएं का भी निर्माण कराया था जो की आज भी स्थित है। इस कुएं का रहस्य आज भी नहीं पता जो की एक अनजान सुरंग से जुड़ा है। इस तरह से प्रतापगढ़ आल्हा ऊदल की तपोभूमि रहा है।
मुगल काल में खंडित हुई माँ वाराही की मूर्ति
मां वाराही का ही नाम चौहरजन देवी: स्थानीय लोगो के कथना अनुसार मुगल शासन काल में माँ वाराही की प्रतिमा को खंडित करके सई नदी में फेंक दिया गया था। इस रहस्य को एक बार तत्कालीन राजा चौहरजा को देवी ने स्वप्न द्वारा अपनी उपस्थिति अवगत कराई। राजा चौहरजा ने वाराही देवी की मूर्ति जल से निकाल कर द्बारा प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। उस समय से ही माँ वाराही का नाम चौहरजन देवी पड़ गया था। चौहरजन देवी धाम पर हर सोमवार और शुक्रवार को मेला लगता है, ऐसी मान्यता है की माँ वाराही देवी के दरबार में माथा लगाकर माँगी गयी हर मुराद अवस्य पूरी होती है।
प्रतापगढ़ का पौराणिक इतिहास
पौराणिक इतिहास पर प्रकाश डालने से ज्ञात होता है कि प्रारम्भ से प्रतापगढ़ क्षेत्र अयोध्या के सूर्यवंशी के अधीन था। जिसकी स्थापना वैवस्तु मनु ने की थी। इस वंश में इक्ष्वाकु पृथु, श्रावस्तु, मान्धता, हरिशचंद्र, सगर, अम्बरीश, दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी शासक हुये। दिलीप के शासन काल में इस क्षेत्र का नाम ‘कोशल’ था । दशरथि व राम के समय कोशल अपनी मर्यादा और वैभव के चरमोत्कर्ष पर था। किन्तु राम के बाद कोशल के विभाजित होने पर अयोध्या उजड़ गयी और पुनः अपने अतीत के गौरव को ना प्राप्त कर सकी।
रामायण में प्रतापगढ़ का वर्णन
तीर्थराज प्रयाग के निकट पतित पावनी गंगा नदी के किनारे बसा प्रतापगढ़ जिला ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।उत्तर प्रदेश का यह जिला रामायण तथा महाभारत के कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। मान्यता है कि बेल्हा की पौराणिक नदी सई के तट से होकर प्रभु श्रीराम वनागमन के समय अयोध्या से दक्षिण की ओर गए थे। उनके चरणो से यहाँ की नदियों के तट पवित्र हुए हैं। भगवान श्रीराम के वनवास यात्रा में उत्तर प्रदेश के जिन पाँच प्रमुख नदियों का जिक्र रामचरित्रमानस में है, उनमे से एक प्रतापगढ़ की सई नदी है। जिसका जिक्र इस प्रकार है।
रामचरित मानस में प्रतापगढ़ वर्णन
सई उतरि गोमतीं नहाए।
चौथे दिवस अवधपुर आये॥
ऐसी भी किवदंती है कि लालगंज तहसील स्थित घुइसरनाथ धाम में भगवान राम ने पूजन पाठ कर दुर्लभ त्रेतायुगी करील वृक्ष की छाया में विश्राम किए थे। जिसका उल्लेख रामायण में कुछ इस तरह है,
नव रसाल वन विहरन शीला।,
सोह कि कोकिल विपिन करीला॥
रामायण के चित्रण में प्रतापगढ़ की बकुलाही नदी का संक्षिप्त उल्लेख “बाल्कुनी” नदी के नाम से हुआ। महर्षि वाल्मिकि द्वारा रचित वाल्मिकि रामायण में इसका वर्णन इन पंक्तियो से है।
सो अपश्यत राम तीर्थम् च नदी बालकुनी तथा बरूठी,
गोमती चैव भीमशालम् वनम् तथा।
महाभारत में प्रतापगढ़ वर्णन
महाभारत: पौराणिक मान्यताओं के आधार पर हंडौर ,पण्डवाजी ,अजगरा महदहा , बारडीह, ऊंचडीह आदि स्थलों को पांडवो से सम्बंधित मन जाता है। इसमें रानीगंज अजगरा से पांडव का नामोल्लेख करने वाला देश का प्राचीनतम अभिलेख भी प्राप्त हुआ है। रानीगंज अजगरा में राजा युधिष्ठिर और यक्ष सवांद हुआ था और जिले के भयहरण नाथ धाम में पांडव ने बकासुर के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। बालकुनी नदी में पूजा स्न्नान कर शिवलिंग की स्थापना महाबली ‘भीमसेन ‘ ने की थी। महाभारत काल में हंडौर राक्षस ‘हिडिम्ब’ का निवास क्षेत्र था और बांकाजलालपुर राक्षस बकासुर का क्षेत्र था। प्रतापगढ़ के चक्रवड़ का जिक्र महाभारत में चक्रपरी नाम से हुआ है।
प्रतापगढ़ का राजनितिक इतिहास
छठी शताब्दी ई० पू ० प्रतापगढ़
छठी शताब्दी ई० पू ० प्रतापगढ़ इतिहास: छठी शताब्दी ई० पू ० में द्वितीय नगरीय क्रांति के समय कौशल १६ महाजनपदों में से एक था। उत्तरी कौशल की राजधानी श्रावस्ती व दक्षिणी कौशल की राजधानी कुशावती थी। साकेत का भी राजधानी के रूप में उल्लेख है जिसकी पहचान अयोद्धा से की जाती है।
मौर्य सम्राज्य एवं प्रतापगढ़
मौर्य सम्राज्य एवं प्रतापगढ़: मौर्य शासक चंदकुप्त और उसके पौत्र’ देवप्रिय , प्रियदर्शी अशोक महान ‘ के राज्य के अंतर्गत यह जनपद था। जनपद के कुछ स्थालो जैसे कुंडा तहसील के बिहार एवं पट्टी तहसील के बिलकर से प्राप्त बौद्ध , विहार , स्तूप के साक्ष्य मिले है। ‘ फियूटेर ‘ के अनुसार अशोक ने विहार से दक्षिण पूर्व दिशा में गंगा के तट पर २०० फुट ऊँचा स्तूफ बनवाया था।
शंगु साम्राज्य एवं प्रतापगढ़
शंगु साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: अयोध्या से मिले अभिलेख के अनुसार कौशल प्रतापगढ़ सहित शंगु के आधीन था। पुष्यमित्र शंगु के शासनकाल में यवनो का हमला हुआ , प्रातापगढ़ क्षेत्र इस हिन्द यवन हमले का शिकार हुआ , इसका प्रमाण लालगंज तहसील के स्थल रॉकी से प्राप्त हिन्द यवन मुद्राये है।
शक का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़
शक का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: प्रतापगढ़ क्षेत्र पर शक का भी अधिपत्य रहा है यंहा से अनेक हिन्द शक मुद्राये और मुर्तिया प्राप्त हुई है।
कनिष्क का शासनकाल एवं प्रतापगढ़
कनिष्क का शासनकाल एवं प्रतापगढ़: कुषाणवंशी महान प्रतापी शासक कनिष्क के साक्ष्य बहुसंख्यक कुषाणकालीन पुरास्थलो से इस बात की पुष्टि होती है।
गुप्त साम्राज्य एवं प्रतापगढ़
गुप्त साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: पुराणों के अनुसार चंदगुप्त प्रथम के अधीन साकेत , मगध , प्रयाग , प्रतापगढ़ , तक का क्षेत्र सम्मिलित था। समुद्रगुप्त , चन्द्रगुप्त , विक्रमादित्य आदि शासको ने भी इस क्षेत्र पर शासन किया।
गुप्तो के पतन के बाद छठी शताब्दी ई ० के प्रारम्भ में यह क्षेत्र कन्नोज के मौखिरियो के आधीन हो गया था। ये मौखरि शासक हर्ष से परास्त हुए। हर्ष समय आया चीनी यात्री ‘ ह्वेनसांग ‘ हयमुख ‘ से गुजरा था जिसका समीकरण रायबरेली व प्रतापगढ़ से किया जाता है।
गर्जर प्रतिहार एवं प्रतापगढ़
नवी शताब्दी में गर्जर प्रतिहार उत्तर प्रदेश भारत के सबसे शक्तिशाली शाशक थे और प्रतापगढ़ क्षेत्र उनके आधीन रहा।
भरो का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़
भरो का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: प्रतापगढ़ क्षेत्र काफी समय तक भरो के आधीन था। इसका मुख्यालय प्राचीन हन्दौर में था, बाद में रैकवार राजपूतो ने इनसे छीन लिया। परम्पराओ के अनुसार 1258 ई ० में लखनसेन ने [जो प्रयाग के सोमवंशी राजपूत परिवार का वंसज ] पहले पांचो सिद्ध फिर हंडौर से भरो एवं रैकवारो को भागकर अपन अधिकार कर लिया। धीरे धीरे उसने पुरे अरोर या अरउल क्षेत्र (प्रतापगढ़ परगना का प्राचीन नाम) को अपना राज्य बना लिया।
मुहम्मद गोरी साम्राज्य एवं प्रतापगढ़
मुहम्मद गोरी साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: 1192 ई ० में मुहम्मद गोरी ने मानिकपुर के शासक मानिकचंद्र एवं उनके बड़े भाई गहड़वाल वंशी जयचंद्र को पराजित कर कड़ा मानिकपुर नाम के एक नए सूबे का निर्माण किया और उसकी राजधानी कड़ा बनाया। क़ुतुब्बुट्दीन यंहा का सूबेदार बनाया गया। इस नए सूबे में पूरा प्रतापगढ़ का क्षेत्र शामिल था।
1290 ई ० में यह सूबा जल्लालुद्दीन फिरोजशाह और अल्लाउद्दीन खिलजी के अधिकार में रहा। उसके बाद तुगलको ने जौनपुर के शर्की एवं दिल्ली के लोदी शासक का प्रभाव प्रतापगढ़ क्षेत्र पर बना रहा।
मुगलो का भारत पर राज्य होने पर अकबर ने मानिकपुर सूबे को समाप्त कर इलाहाबाद के सूबेदार को इस क्षेत्र का प्रशासक बनाया। प्रतापगढ़ परगना इस समय अरोर के महल के नाम से जाना जाता था।
प्रतापगढ़ के किले का इतिहास
1628 ई ० में एक स्थानीय राजा, सोमवंशी राजपूत राजा प्रताप बहादुर, जिनका कार्यकाल सन् 1628 से 1682 के बीच में था, उन्होंने अपना मुख्यालय रामपुर के निकट एक पुराने कस्बे अरोर में स्थापित किया, जहाँ उन्होंने एक किले का निर्माण किया और अपने ही नाम पर उसका नाम प्रतापगढ़ ( प्रताप का किला ) रखा। जब 1858 में जिले का पुनर्गठन किया गया तब इसका मुख्यालय बेल्हा में स्थापित किया गया जो अब बेल्हा- प्रतापगढ़ से विख्यात हैं।
प्रतापगढ़ ईस्ट इंडिया कंपनी
प्रतापगढ़ ईस्ट इंडिया कंपनी: फ़रवरी 1856 ई ० में अंग्रेजो द्वारा अवध को ब्रिटिश भाषा में मिला लेने से प्रतापगढ़ ईस्ट इंडिया कंपनी के आधीन हों गया।
प्रतापगढ़ और स्वतंत्रता संग्राम
1857 ई ० में कालाकांकर के राजा हनुमंत सिंह ने अंग्रेजो द्वारा अवध के हथियाने का खूब जमकर विरोध किया। हनुमंत सिंह के पुत्र प्रतापसिंह अपने चाचा माधो सिंह के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हो गए। यंहा तरउल के गुलाब सिंह , अठेहा के राम गुलाब सिंह , सुखखार के बालभद्र सिंह , मुतफाबाद के रामगुलाब सिंह आदि ने स्वयं को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर लिया था, परन्तु नवम्बर 1858 ई ० ब्रिटिश हुकूमत ने पुनः प्रतापगढ़ पैर कब्ज़ा कर लिया।
प्रतापगढ़ किसान आंदोलन
1886 ई ० में किसानो का शोषण होने लगा। इस शोषण के परिणाम स्वरुप 1920 ई ० में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसान आंदोलन।, किसान एकता एवं संघर्ष के प्रति जागरूकता उत्तपन हुई।
पं ० जवाहर लाल नेहरू ने जून 1920 ई ० में पट्टी के रूरे ग्राम में जाकर किसान आंदोलन का नेतृत्व होने हाथ में लिया। यंही से उन्होंने पद यात्रा करके अपने राजनैतिक करियर कि शुरुआत की थी।
1920 ई ०में ही महात्मा गाँधी ने सार्वजनिक सभा में असहयोग आंदोलन तथा नमक आंदोलन के लिये स्वयं सेवको का दल गठित किया , जिसमे शयाम सुन्दर शुक्ला , माता बदल , मजहरुल हुसैन प्रमुख थे।
1930 ई ० में सविनय आज्ञा आंदोलन का आमजन के साथ कालाकांकर , भदरी आदि के राजाओ ने भी खुला समर्थन किया। 9 दिसम्बर 1931 ई ० को नेहरू ने पुनः प्रतापगढ़ का दौरा कर किसानो से भूमि कर न अदा करने को कहा।
16 फ़रवरी 1931 ई ० को पट्टी तहसील के गौरा विकास खंड में स्थित कहला ग्राम में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए कलिका प्रसाद , रामदास एवं मथुरा प्रसाद जैसे देशभक्त ने अपने प्राण समर्पित कर दिया।
1973 ई ० में हुए विधान सभा चुनाव में इस जिले की दो सीटे कांग्रेस के गोविन्द मालवीय और हरिश्चंद्र वाजपेयी ने जीती।
1942 ई ० में भारत छोड़ो आंदोलन में इस जिले के अम्बिका सिंह एवं राजमंगल सिंह भी शामिल थे।
1946ई ० में विधान सभा चुनाव में पुनः इस जिले की दो सीटे कांग्रेस ने जीती। अब तक अंग्रेजो ने महसूस कर लिया की वे भारत में और दिनों तक राज नहीं कर सकते फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत स्वन्त्र हुआ और प्रतापगढ़ जिला स्वतंत्र भारत के एक जिले के रूप में अस्तित्व में आया।
प्रतापगढ़ का भगौलिक क्षेत्र
प्रतापगढ़ भगौलिक स्थिति: आंवले के लिए पुरे देश में महशूर शहर उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख जिला है। जो सन 1858 में अस्तित्व में आया। प्रतापगढ़ क़स्बा जिले का मुख्यालय है। यह जिला प्रयागराज मंडल एक हिस्सा है। यह जिला 25 ० 34′ और 26० 11′ उत्तरी अक्षांश के बीच समानताएं एवं 81 ० 19 ‘ meridians और 82० 27’ पूर्व देशान्तर कुछ 110 किमी के लिए विस्तार के बीच स्थित है। यह उत्तर में सुल्तानपुर जिला , दक्षिण में प्रयागराज जिला , पूर्व में जौनपुर जिला और पश्चिम में अमेठी जिला से घिरा है दक्षिण – पक्षिम में गंगा के बारे में 50 किमी के लिये जिले की सीमा रूपों , फतेहपुर और प्रयागराज से एवं उत्तर पूर्व गोमती में अलग रूपों के बारे में 6 किमी के लिए सीमा केन्द्रीय सांख्यकी संगठन , भारत के अनुसार , जिले km2 3730 के एक क्षेत्र गंगा है गंगा और सई नदी इस जिले में बहने वाली प्रमुख नदिया है
प्रतापगढ़ शहर में जन स्तर सन 2012 के अनुसार 80 फिट से लेकर 140 फिट तक है। ये जिला प्रयागराज फैजाबाद के मुख्य सड़क पर , 61 किलोमीटर प्रयागराज से और 31 किलोमीटर सुल्तानपुर से दूर पड़ता है।
समुद्र तल से इस जिले की ऊंचाई 137 मीटर के लगभग है। ये पूर्व से पश्चिम की ओर 110 किलोमीटर फैला हुआ है। इसके दक्षिण पश्चिम में गंगा नदी 50 किलोमीटर का घेरा बनाती है जो इसे प्रयागराज एवं कौसाम्बी [ फतेहपुर ] से अलग करती है। गंगा, सई , बकुलाही यँहा की प्रमुख नदिया है। लोनी तथा सरकनी नदी जनपद में बहती है। उत्तर – पूर्व में गोमती नदी लगभग 6 किलोमीटर का घेरा बनाते हुए प्रवाहित होती है।
प्रतापगढ़ का मौसम
प्रतापगढ़ का मौसम: प्रतापगढ़ में मानसून का अप्रैल के पहले या दूसरे सप्ताह से शुरु हो जाता है। बारिश की हल्की-हल्की बूंदा-बादी, ठण्ड हवाओं के तेज झोंके व हर तरफ पेड़ों पर दिखने वाली हरियाली बड़ी ही सुन्दर लगती है। गर्मी का मौसम यहाँ पर मार्च के आखिरी सप्ताह से शुरू हो जाता है। लेकिन कूलर चलाने की नौबत अप्रैल से ही पड़ती है। मई-जून में गर्मी का प्रकोप हर वर्ग को झेलना पड़ता है। जुलाई से बारिश की ठण्डी फुहारें आये दिन मौसम को नमी बनाये रखती है । अक्टूबर तक बूंदा – बांदी का ये सिलसिला चलता रहता है। नवम्बर में हल्की – हलकी ठण्ड शुरू हो जाती है। घर के पंखे बंद होने लगते हैं और स्वेटर व रजाई आलमारी से बाहर आकर छतों पर धूप सेकने के लिये तैयार हो जाते हैं। मैदानी व समुद्र तल से अधिक ऊँचाई पर होने के कारण ये इलाका बाढ़ मुक्त है। जनवरी व फरवरी में कड़ाके की ठण्ड के साथ ही भयानक कोहरा व धुंध सुबह के वक्त राजमार्गों पर वाहनों के लिये समस्या उत्पन्न कर देता है जिससे न चाहते हुये भी लोगों को वाहनों की हैड लाइट जलानी ही पड़ती है। प्रतापगढ़ जिले का गरमियों में अधिकतम तापमान लगभग ४६ डिग्री व सर्दियों में न्युनतम तापमान लगभग 3 डिग्री के लगभग होता है।
प्रतापगढ़ की जनसँख्या
| 2020 में प्रतापगढ़ की अनुमानित जनसंख्या | 3,718,111 |
|---|---|
| 2021 में पुरुषों की अनुमानित जनसंख्या | 1,860,810 |
| 2021 में महिलाओं की अनुमानित जनसंख्या | 1,857,301 |
| 2011 में प्रतापगढ़ की कुल आबादी | 3,209,141 |
| पुरुषों की जनसंख्या | 1,606,085 |
| महिलाओं की जनसंख्या | 1,603,056 |
| बच्चों की जनसंख्या 0-6 वर्ष | 453,347 |
| लड़कों की जनसंख्या 0-6 वर्ष | 236,478 |
| लड़कियों की जनसंख्या 0-6 वर्ष | 216,869 |
| क्षेत्रफल (प्रति वर्ग कि.मी.) | 3,717 |
| लिंगानुपात | 998 |
| बच्चों का लिंगानुपात 0-6 वर्ष | 917 |
| कुल साक्षरता | 1,931,559 |
| शिक्षित पुरुष | 1,121,381 |
| शिक्षित महिलाये | 810,178 |
| साक्षरता (प्रतिशत में ) | 70.09% |
| शिक्षित पुरुष (प्रतिशत में ) | 81.88% |
| शिक्षित महिलाये (प्रतिशत में ) | 58.45% |
| बच्चों की आबादी, निवासी, जन-संख्य (population) (प्रतिशत में ) 0-6 वर्ष | 14.13% |
| लड़कों की आबादी, निवासी, जन-संख्य (population) (प्रतिशत में ) 0-6 वर्ष | 14.72% |
| लड़कियों की आबादी, निवासी, जन-संख्य (population) (प्रतिशत में ) 0-6 वर्ष | 13.53% |
प्रतापगढ़ की आबादी धर्म के अनुसार
| धर्म | 2011 जनसंख्या | प्रतिशत | 2021 की अनुमानित जनसंख्या |
|---|---|---|---|
| हिंदू धर्म | 2,731,351 | 85.11% | 3,164,543 |
| मुस्लिम धर्म | 452,394 | 14.10% | 524,144 |
| ईसाई धर्म | 3,920 | 0.12% | 4,542 |
| सिख अनुनाइ | 1,451 | 0.05% | 1,681 |
| बौद्ध धर्म | 7,795 | 0.24% | 9,031 |
| जैन धर्म | 746 | 0.02% |


