प्रतापगढ़ का सम्पूर्ण इतिहास Complete History of Pratapgarh in Hindi

प्रतापगढ़ का अनोखा इतिहास

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प्रतापगढ़ की गौरवशाली एवं वैभवशाली गाथा

प्रतापगढ़ इतिहास: प्रतापगढ़ का इतिहास गंगा यमुनी तहजीब हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख, जैन एवं क्रिश्चन सर्ब धर्म सांप्रदायिक सदभाव, आध्यात्मिक, वैदिक, पौराणिक, शिक्षा, संस्कृति, संगीत, कला, सुन्दर भवन, धार्मिक, मंदिर, मस्जिद, ऐतिहासिक दुर्ग, गौरवशाली सांस्कृतिक कला की प्राचीन धरोहर को आदिकाल से अब तक अपने आप में समेटे हुए प्रतापगढ़ (अवध) का विशेष इतिहास रहा है। परिवर्तन के शाश्वत नियम के अनेक प्राकृतिक, राजनैतिक, आर्थिक झंझावतों के बावजूद प्रतापगढ़ का अस्तित्व अदभुत, अलौकिक, अकल्पनीय, अविश्वसनीय एवं अतुलनीय रहा है।

Index of Content

Pratapgarh ki Bhasha

प्रतापगढ़ की भाषा: हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृति, उर्दू , अवधी, भोजपुरी, प्रतापगढ़ी आदि  प्रतापगढ़ की मुख्य भाषा है। प्रतापगढ़ की शासकीय भाषा हिंदी है। प्रतापगढ़ जनपद के बोलचाल की लोकप्रिय भाषा अवधी अपने आप में हिंदुस्तान की सभी लिखित अलिखित/ मौखिक भाषा एवं बोलियों को अपने आप में समाये हुए संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में अपना विशेष महत्व रखती है। उदहारण के लिए विश्व स्तरीय महाकाब्य रामचरित मानस तुलसीदास ने अवधी में ही लिखा है। प्रतापगढ़ की कथा:-

प्रतापगढ़ का गौरव

प्रतापगढ़ का इतिहास: प्रतापगढ़ भारत के  राज्य उत्तर प्रदेश के 72 वां  जिले के  रूप में जाना जाता है। इसे लोग बेल्हा भी कहते हैं क्योकि यहाँ बेल्हा देवी मंदिर है जो कि सई नदी के किनारे बसा है।  यह जिला एतिहासिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। एक स्थानीय राजा,  सोमवंशी राजपूत राजा प्रताप बहादुर, जिनका कार्यकाल सन् 1628 से  1682 के  बीच में था,  उन्होंने अपना मुख्यालय रामपुर के निकट एक पुराने कस्बे अरोर में स्थापित किया,  जहाँ उन्होंने एक किले का निर्माण किया और अपने ही नाम पर उसका नाम प्रतापगढ़ (प्रताप का किला) रखा।  जब 1858 में जिले का पुनर्गठन किया गया तब इसका मुख्यालय बेल्हा में स्थापित किया गया जो अब बेल्हा- प्रतापगढ़  से विख्यात हैं।

प्रतापगढ़ का अनछुआ इतिहास 2024

प्रतापगढ़ का सम्पूर्ण इतिहास Complete History of Pratapgarh @ pratapgarh.nic.in

प्रतापगढ़ का प्राचीन इतिहास 

प्रतापगढ़ प्रागैतिहासिक काल से ही काफी अहम भूमिका में रहा है। पौराणिक मान्यताएं से  प्रतापगढ़ का समबन्ध रामायण और महाभारत के विभिन्न कथानकों से जोड़त है  किन्तु प्राचीन काल से देखने पर इस जनपद का इतिहास मानव जीवन की  शैशवावस्था से जुड़ा दिखाई देता है।  जब हम  असभ्य,  खानाबदोश तथा आखेट के  सहारे जीवन यापन कर रहे थे।

Itihas Pratapgarh

पुरातात्विक अवशेषणो से  हमें  पता  चलता है कि उच्च पुरापाषाणिक संस्कृति जनपद की प्राचीनतम संस्कृति है। इस संस्कृति के प्रमाण सुलेमान पर्वतपुर ,मंदिर और साल्हीपुर से  पत्थर के  औजार प्राप्त हुये हैं। इस संस्कृति को वेदों में  लगभग 1700 ईo पूo के  आसपास माना जाता है।

प्रतापगढ़ का मध्यकालीन इतिहास 

प्रतापगढ़ जनपद के  सर्वाधिक पुरास्थल लगभग 200  की संख्या में इसी संस्कृति से है। जिनमें से तीन सराय नहर राय , मसीहा तथा दमदमा का उत्खनन भी किया गया है। जहां से बड़ी संख्या में मानव कंकाल,  पत्थर के औजार मिले हैं।

प्रतापगढ़ का आधुनिक इतिहास 

Pratapgarh ki Khoj

प्रारम्भिक संस्कृति में इस जनपद का कोई भी स्थल प्रकाश में नहीं आया, परन्तु इसके बाद की संस्कृति ताम्र पाषाणिक (तांबे के  औजार) से  जुड़े लगभग 30 पुरास्थल पट्टी तहसील से प्रकाश में आये हैं।  जिनमें भांटी,  भेवनी, गंगेहटी, कंजाखास, पूरे देवजानी, सराय, समुद्री आदि हैं। रानीगंज तहसील से चौहरजन नामक स्थान से भी इस संस्कृति के पात्र की परम्परा प्राप्त हुई है।

Pratapgarh ka Map

वीरगाथा काल प्रतापगढ़

आल्हा ऊदल और प्रतापगढ़

माँ वाराही देवी धाम प्रतापगढ़: माँ वाराही देवी का धाम प्रतापगढ़ जनपद के रानीगंज तहसील के उत्तर दिशा में 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। मान्यता है की इस मंदिर की स्थापना 12वीं सदी में दो वीर भाइयों ने की थी जिनका नाम आल्हा और ऊदल था। अनेक लड़ाइयों में विजय प्राप्ति के लिए आल्हा ऊदल ने यहाँ पर वाराही देवी की स्तुति की थी। मंदिर के साथ ही आल्हा ने एक कुएं का भी निर्माण कराया था जो की आज भी स्थित है। इस कुएं का रहस्य आज भी नहीं पता जो की एक अनजान सुरंग से जुड़ा है। इस तरह से प्रतापगढ़ आल्हा ऊदल की तपोभूमि रहा है।

मुगल काल में  खंडित हुई माँ वाराही की मूर्ति 

मां वाराही का ही नाम चौहरजन देवी: स्थानीय लोगो के कथना अनुसार मुगल शासन काल में माँ वाराही की प्रतिमा को खंडित करके सई नदी में फेंक दिया गया था। इस रहस्य को एक बार तत्कालीन राजा चौहरजा को देवी ने स्वप्न द्वारा अपनी उपस्थिति अवगत कराई। राजा चौहरजा ने वाराही देवी की मूर्ति जल से निकाल कर द्बारा प्राण प्रतिष्ठा कराई थी।  उस समय से ही माँ वाराही का नाम चौहरजन देवी पड़ गया था। चौहरजन देवी धाम पर हर सोमवार और शुक्रवार को मेला लगता है, ऐसी मान्यता है की माँ वाराही देवी के दरबार में माथा लगाकर माँगी गयी हर मुराद अवस्य पूरी होती है।

प्रतापगढ़ का पौराणिक इतिहास 

पौराणिक इतिहास पर प्रकाश डालने से  ज्ञात होता है कि प्रारम्भ से प्रतापगढ़ क्षेत्र अयोध्या के सूर्यवंशी के अधीन था। जिसकी स्थापना वैवस्तु मनु ने की थी। इस वंश में  इक्ष्वाकु पृथु,  श्रावस्तु, मान्धता,  हरिशचंद्र, सगर, अम्बरीश, दिलीप,  रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी शासक हुये। दिलीप के शासन काल में इस क्षेत्र का नाम ‘कोशल’ था । दशरथि व राम के समय कोशल अपनी मर्यादा और वैभव के  चरमोत्कर्ष पर था। किन्तु राम के बाद कोशल के विभाजित होने पर अयोध्या उजड़ गयी और पुनः अपने अतीत के  गौरव को ना प्राप्त कर सकी।

रामायण में प्रतापगढ़ का वर्णन 

तीर्थराज प्रयाग के निकट पतित पावनी गंगा नदी के किनारे बसा प्रतापगढ़ जिला ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।उत्तर प्रदेश का यह जिला रामायण तथा महाभारत के कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। मान्यता है कि बेल्हा की पौराणिक नदी सई के तट से होकर प्रभु श्रीराम वनागमन के समय अयोध्या से दक्षिण की ओर गए थे। उनके चरणो से यहाँ की नदियों के तट पवित्र हुए हैं। भगवान श्रीराम के वनवास यात्रा में उत्तर प्रदेश के जिन पाँच प्रमुख नदियों का जिक्र रामचरित्रमानस में है, उनमे से एक प्रतापगढ़ की सई नदी है। जिसका जिक्र इस प्रकार है।

रामचरित मानस में प्रतापगढ़ वर्णन 

सई उतरि गोमतीं नहाए।

चौथे दिवस अवधपुर आये॥

ऐसी भी किवदंती है कि लालगंज तहसील स्थित घुइसरनाथ धाम में भगवान राम ने पूजन पाठ कर दुर्लभ त्रेतायुगी करील वृक्ष की छाया में विश्राम किए थे। जिसका उल्लेख रामायण में कुछ इस तरह है,

नव रसाल वन विहरन शीला।,

सोह कि कोकिल विपिन करीला॥

रामायण के चित्रण में प्रतापगढ़ की बकुलाही नदी का संक्षिप्त उल्लेख “बाल्कुनी” नदी के नाम से हुआ। महर्षि वाल्मिकि द्वारा रचित वाल्मिकि रामायण में इसका वर्णन इन पंक्तियो से है।

सो अपश्यत राम तीर्थम् च नदी बालकुनी तथा बरूठी,

गोमती चैव भीमशालम् वनम् तथा।

महाभारत में प्रतापगढ़ वर्णन 

महाभारत: पौराणिक मान्यताओं के आधार पर हंडौर ,पण्डवाजी ,अजगरा महदहा , बारडीह, ऊंचडीह आदि स्थलों को पांडवो से सम्बंधित मन जाता है।  इसमें रानीगंज अजगरा से पांडव का नामोल्लेख करने वाला देश का प्राचीनतम अभिलेख भी प्राप्त हुआ है।  रानीगंज अजगरा में राजा युधिष्ठिर और यक्ष सवांद हुआ था और जिले के भयहरण नाथ धाम में पांडव ने बकासुर के आतंक से मुक्ति दिलाई थी।  बालकुनी नदी में पूजा स्न्नान कर शिवलिंग की स्थापना महाबली ‘भीमसेन ‘ ने की थी।  महाभारत  काल में हंडौर राक्षस  ‘हिडिम्ब’ का निवास क्षेत्र था और बांकाजलालपुर राक्षस बकासुर का क्षेत्र था।  प्रतापगढ़ के चक्रवड़ का जिक्र महाभारत में चक्रपरी नाम से हुआ है।

प्रतापगढ़ का राजनितिक इतिहास

छठी शताब्दी ई० पू ० प्रतापगढ़ 

छठी शताब्दी ई० पू ० प्रतापगढ़ इतिहास: छठी शताब्दी ई० पू ० में   द्वितीय नगरीय क्रांति के समय कौशल १६ महाजनपदों में से एक था।  उत्तरी कौशल की राजधानी श्रावस्ती व दक्षिणी कौशल की राजधानी कुशावती थी।  साकेत का भी राजधानी के रूप में उल्लेख है जिसकी पहचान अयोद्धा से की जाती है।

मौर्य सम्राज्य एवं प्रतापगढ़

मौर्य सम्राज्य एवं प्रतापगढ़: मौर्य शासक चंदकुप्त और उसके पौत्र’ देवप्रिय , प्रियदर्शी अशोक महान ‘ के राज्य के अंतर्गत यह जनपद था।  जनपद के कुछ स्थालो जैसे कुंडा तहसील के बिहार एवं पट्टी तहसील के बिलकर से प्राप्त बौद्ध , विहार , स्तूप के साक्ष्य मिले है।  ‘ फियूटेर ‘ के अनुसार अशोक ने विहार से दक्षिण पूर्व  दिशा में गंगा के तट  पर २०० फुट ऊँचा स्तूफ बनवाया था।

शंगु साम्राज्य एवं प्रतापगढ़

शंगु साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: अयोध्या से मिले अभिलेख के अनुसार कौशल प्रतापगढ़ सहित शंगु के आधीन था।  पुष्यमित्र  शंगु के शासनकाल में यवनो का हमला हुआ , प्रातापगढ़ क्षेत्र इस हिन्द यवन हमले का शिकार हुआ , इसका प्रमाण लालगंज तहसील के स्थल रॉकी से प्राप्त हिन्द यवन मुद्राये है।

शक का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़

शक का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़:  प्रतापगढ़ क्षेत्र पर शक का भी अधिपत्य रहा है यंहा से अनेक हिन्द शक मुद्राये और मुर्तिया प्राप्त हुई है।

कनिष्क का शासनकाल एवं प्रतापगढ़

कनिष्क का शासनकाल एवं प्रतापगढ़ कुषाणवंशी महान प्रतापी शासक कनिष्क के साक्ष्य बहुसंख्यक  कुषाणकालीन पुरास्थलो से इस बात की पुष्टि होती है।

गुप्त साम्राज्य एवं प्रतापगढ़

गुप्त साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: पुराणों के अनुसार चंदगुप्त प्रथम के अधीन साकेत , मगध , प्रयाग , प्रतापगढ़ , तक का क्षेत्र सम्मिलित था।  समुद्रगुप्त , चन्द्रगुप्त , विक्रमादित्य आदि शासको ने भी इस क्षेत्र पर शासन किया।

गुप्तो के पतन के बाद छठी शताब्दी ई ० के प्रारम्भ में यह क्षेत्र कन्नोज के मौखिरियो के आधीन हो गया था।  ये मौखरि शासक हर्ष से परास्त हुए।  हर्ष समय आया चीनी यात्री ‘ ह्वेनसांग ‘ हयमुख ‘ से गुजरा था जिसका समीकरण रायबरेली व प्रतापगढ़ से किया जाता है।

गर्जर प्रतिहार एवं प्रतापगढ़

नवी शताब्दी में गर्जर प्रतिहार उत्तर प्रदेश भारत के सबसे शक्तिशाली शाशक थे और प्रतापगढ़ क्षेत्र उनके आधीन रहा।

भरो का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़

भरो का साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: प्रतापगढ़ क्षेत्र काफी समय तक भरो के आधीन था।  इसका मुख्यालय प्राचीन हन्दौर में था, बाद में रैकवार राजपूतो ने इनसे छीन लिया।  परम्पराओ के अनुसार 1258 ई ० में लखनसेन ने [जो प्रयाग के सोमवंशी राजपूत परिवार का वंसज ] पहले पांचो सिद्ध फिर हंडौर से भरो एवं रैकवारो को भागकर अपन अधिकार कर लिया।  धीरे धीरे उसने पुरे अरोर या अरउल क्षेत्र (प्रतापगढ़ परगना का प्राचीन नाम) को अपना राज्य बना लिया।

मुहम्मद गोरी साम्राज्य एवं प्रतापगढ़

मुहम्मद गोरी साम्राज्य एवं प्रतापगढ़: 1192 ई ० में मुहम्मद गोरी ने मानिकपुर के शासक मानिकचंद्र एवं उनके बड़े भाई गहड़वाल वंशी जयचंद्र को पराजित कर कड़ा मानिकपुर नाम के एक नए सूबे का निर्माण  किया  और उसकी राजधानी कड़ा  बनाया।  क़ुतुब्बुट्दीन यंहा का सूबेदार बनाया गया।  इस नए सूबे में पूरा प्रतापगढ़ का क्षेत्र शामिल था।

1290 ई ० में यह सूबा जल्लालुद्दीन फिरोजशाह और अल्लाउद्दीन खिलजी के अधिकार में रहा।  उसके बाद  तुगलको ने जौनपुर के शर्की एवं दिल्ली के लोदी शासक का प्रभाव प्रतापगढ़ क्षेत्र पर बना रहा।

मुगलो का भारत पर राज्य होने पर अकबर ने मानिकपुर सूबे को समाप्त कर इलाहाबाद के सूबेदार को इस क्षेत्र का प्रशासक बनाया।  प्रतापगढ़ परगना इस समय अरोर के महल के नाम से जाना जाता था।

प्रतापगढ़ के किले का इतिहास 

1628 ई ० में एक स्थानीय राजा,  सोमवंशी राजपूत राजा प्रताप बहादुर, जिनका कार्यकाल सन् 1628 से  1682 के  बीच में था,  उन्होंने अपना मुख्यालय रामपुर के निकट एक पुराने कस्बे अरोर में स्थापित किया,  जहाँ उन्होंने एक किले का निर्माण किया और अपने ही नाम पर उसका नाम प्रतापगढ़ ( प्रताप का किला ) रखा।  जब 1858 में जिले का पुनर्गठन किया गया तब इसका मुख्यालय बेल्हा में स्थापित किया गया जो अब बेल्हा- प्रतापगढ़  से विख्यात हैं।

प्रतापगढ़ ईस्ट इंडिया कंपनी

प्रतापगढ़ ईस्ट इंडिया कंपनी: फ़रवरी 1856 ई ० में अंग्रेजो द्वारा अवध को ब्रिटिश भाषा में मिला लेने से प्रतापगढ़ ईस्ट इंडिया कंपनी के आधीन हों गया।

प्रतापगढ़ और स्वतंत्रता संग्राम 

1857 ई ० में कालाकांकर के राजा हनुमंत सिंह ने अंग्रेजो द्वारा अवध के हथियाने का खूब जमकर विरोध किया।  हनुमंत सिंह के पुत्र प्रतापसिंह  अपने चाचा माधो सिंह के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हो गए।  यंहा तरउल के गुलाब सिंह , अठेहा के राम गुलाब सिंह , सुखखार के बालभद्र सिंह , मुतफाबाद के रामगुलाब सिंह आदि ने स्वयं को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर लिया था, परन्तु नवम्बर 1858 ई ० ब्रिटिश हुकूमत ने पुनः प्रतापगढ़ पैर कब्ज़ा कर लिया।

प्रतापगढ़ किसान आंदोलन

1886 ई ० में किसानो का शोषण होने लगा।  इस शोषण के परिणाम स्वरुप 1920 ई ० में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसान आंदोलन।, किसान  एकता एवं संघर्ष के प्रति जागरूकता उत्तपन  हुई।

पं ० जवाहर लाल नेहरू ने जून 1920 ई ० में पट्टी के रूरे ग्राम में जाकर किसान आंदोलन का नेतृत्व होने हाथ में लिया।  यंही से उन्होंने पद यात्रा करके अपने राजनैतिक करियर कि शुरुआत की थी।

1920 ई ०में ही महात्मा गाँधी ने सार्वजनिक सभा में असहयोग आंदोलन तथा नमक आंदोलन के लिये स्वयं सेवको का दल गठित किया , जिसमे शयाम सुन्दर शुक्ला , माता बदल , मजहरुल हुसैन प्रमुख थे।

1930 ई ० में सविनय आज्ञा आंदोलन का आमजन के साथ कालाकांकर , भदरी आदि के राजाओ ने भी खुला समर्थन किया।  9 दिसम्बर 1931 ई ० को नेहरू ने पुनः प्रतापगढ़ का दौरा कर किसानो से भूमि कर न अदा करने को कहा।

16 फ़रवरी 1931 ई ० को पट्टी तहसील के गौरा विकास खंड में स्थित कहला ग्राम में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए कलिका प्रसाद , रामदास एवं मथुरा प्रसाद जैसे देशभक्त ने अपने प्राण समर्पित कर दिया।

1973 ई ० में हुए विधान सभा चुनाव में इस जिले की दो सीटे कांग्रेस के गोविन्द मालवीय और हरिश्चंद्र वाजपेयी ने जीती।

1942 ई ० में भारत छोड़ो आंदोलन में इस जिले के अम्बिका सिंह एवं राजमंगल सिंह भी शामिल थे।

1946ई ० में विधान सभा चुनाव में पुनः इस जिले की दो सीटे कांग्रेस ने जीती।  अब तक अंग्रेजो ने महसूस कर लिया की वे भारत में और दिनों तक राज नहीं कर सकते फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत स्वन्त्र हुआ और प्रतापगढ़ जिला स्वतंत्र भारत के एक जिले के रूप में अस्तित्व में आया।

प्रतापगढ़ का भगौलिक क्षेत्र

प्रतापगढ़ भगौलिक स्थिति: आंवले के लिए पुरे देश में महशूर शहर उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख जिला है।  जो सन 1858 में अस्तित्व में आया। प्रतापगढ़ क़स्बा जिले का मुख्यालय है।  यह जिला प्रयागराज मंडल एक हिस्सा है।  यह जिला 25 ०  34′ और 26०  11′ उत्तरी अक्षांश के बीच समानताएं एवं 81 ०  19 ‘ meridians और 82०   27’ पूर्व देशान्तर कुछ 110 किमी के लिए विस्तार के बीच स्थित है। यह उत्तर में सुल्तानपुर जिला , दक्षिण में प्रयागराज जिला , पूर्व में जौनपुर जिला और पश्चिम में अमेठी जिला से घिरा है दक्षिण – पक्षिम में गंगा के बारे में 50 किमी के लिये जिले की सीमा रूपों , फतेहपुर और  प्रयागराज से एवं उत्तर पूर्व गोमती में अलग रूपों के बारे में 6 किमी के लिए सीमा केन्द्रीय सांख्यकी संगठन , भारत के अनुसार , जिले km2 3730 के एक क्षेत्र गंगा है गंगा और सई नदी इस जिले में बहने वाली प्रमुख नदिया है

प्रतापगढ़ शहर में जन स्तर सन 2012 के अनुसार 80 फिट से लेकर 140 फिट  तक है।  ये जिला प्रयागराज फैजाबाद के मुख्य  सड़क पर , 61 किलोमीटर प्रयागराज से और 31 किलोमीटर सुल्तानपुर से दूर पड़ता है।

समुद्र तल  से इस जिले की ऊंचाई 137 मीटर के लगभग है। ये पूर्व से पश्चिम की ओर 110 किलोमीटर फैला हुआ है।  इसके दक्षिण पश्चिम में गंगा नदी 50 किलोमीटर का घेरा बनाती है जो इसे प्रयागराज एवं कौसाम्बी [ फतेहपुर ] से अलग करती है।  गंगा, सई , बकुलाही यँहा की प्रमुख नदिया है।  लोनी तथा सरकनी नदी जनपद में बहती है।  उत्तर – पूर्व में गोमती नदी लगभग 6 किलोमीटर का घेरा बनाते हुए प्रवाहित होती है।

प्रतापगढ़ का मौसम

प्रतापगढ़ का मौसम: प्रतापगढ़ में मानसून का अप्रैल के पहले या दूसरे सप्ताह से शुरु हो जाता है।  बारिश  की हल्की-हल्की बूंदा-बादी, ठण्ड हवाओं के तेज झोंके व हर तरफ पेड़ों पर दिखने वाली हरियाली बड़ी ही सुन्दर लगती है। गर्मी का मौसम यहाँ पर मार्च के आखिरी सप्ताह से शुरू हो जाता है। लेकिन कूलर चलाने की नौबत अप्रैल से ही पड़ती है। मई-जून में गर्मी का प्रकोप हर वर्ग को झेलना पड़ता है। जुलाई से बारिश की ठण्डी फुहारें आये दिन मौसम को नमी बनाये रखती है । अक्टूबर तक बूंदा – बांदी का ये सिलसिला चलता रहता है। नवम्बर में हल्की – हलकी ठण्ड शुरू हो जाती है।  घर के पंखे बंद होने लगते हैं और स्वेटर व रजाई आलमारी से बाहर आकर छतों पर धूप सेकने के लिये तैयार हो जाते हैं। मैदानी व समुद्र तल से अधिक ऊँचाई पर होने के कारण ये इलाका बाढ़ मुक्त है। जनवरी व फरवरी में कड़ाके की ठण्ड के साथ ही भयानक कोहरा व धुंध सुबह के वक्त राजमार्गों पर वाहनों के लिये समस्या उत्पन्न कर देता है जिससे न चाहते हुये भी लोगों को वाहनों की हैड लाइट जलानी ही पड़ती है। प्रतापगढ़ जिले का गरमियों में अधिकतम तापमान लगभग ४६ डिग्री व सर्दियों में न्युनतम तापमान लगभग 3 डिग्री के लगभग होता है।

प्रतापगढ़ की जनसँख्या

2020 में प्रतापगढ़ की अनुमानित जनसंख्या3,718,111
2021 में पुरुषों की अनुमानित जनसंख्या1,860,810
2021 में महिलाओं की अनुमानित जनसंख्या1,857,301
2011 में प्रतापगढ़ की कुल आबादी 3,209,141
पुरुषों की जनसंख्या 1,606,085
महिलाओं की जनसंख्या 1,603,056
बच्चों की जनसंख्या 0-6 वर्ष453,347
लड़कों की जनसंख्या 0-6 वर्ष236,478
लड़कियों की जनसंख्या 0-6 वर्ष 216,869
क्षेत्रफल (प्रति वर्ग कि.मी.) 3,717
लिंगानुपात 998
बच्चों का लिंगानुपात 0-6 वर्ष917
कुल साक्षरता1,931,559
शिक्षित पुरुष
1,121,381
शिक्षित महिलाये 810,178
साक्षरता (प्रतिशत में )70.09%
शिक्षित पुरुष (प्रतिशत में ) 81.88%
शिक्षित महिलाये (प्रतिशत में ) 58.45%
बच्चों की आबादी, निवासी, जन-संख्य (population) (प्रतिशत में ) 0-6 वर्ष14.13%
लड़कों की आबादी, निवासी, जन-संख्य (population) (प्रतिशत में ) 0-6 वर्ष14.72%
लड़कियों की आबादी, निवासी, जन-संख्य (population) (प्रतिशत में ) 0-6 वर्ष13.53%

प्रतापगढ़ की आबादी धर्म के अनुसार 

धर्म2011 जनसंख्याप्रतिशत2021 की अनुमानित जनसंख्या
हिंदू धर्म2,731,35185.11%
3,164,543
मुस्लिम धर्म 452,39414.10%524,144
ईसाई धर्म 3,920
0.12%4,542
सिख अनुनाइ 1,451
0.05%1,681
बौद्ध धर्म 7,795
0.24%
9,031
जैन धर्म 7460.02%
864
अघोषित लोग 11,4410.36%13,256
अन्य430.00%50
कुल3,209,141
100%
3,718,111

प्रतापगढ़ की साक्षरता

2011 की जनगणना के अनुसार प्रतापगढ़ की कुल आबादी      3,209,141 है। इनमें 1,606,085 पुरुष और 1,603,056 महिलाएं शामिल हैं। प्रतापगढ़ में  (2011) में कराए गए सर्वे के अनुसार 1277582 लोग निरक्षर हैं। इनमें 15 वर्ष से अधिक उम्र के युवा, महिला एवं पुरुष शामिल हैं। वर्ष 2011 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रतापगढ़ का साक्षरता के क्षेत्र में प्रदेश में 31 वा स्थान है। जिले का कुल साक्षरता प्रतिशत 70.09%  है। प्रतापगढ़ से कम प्रतिशत सिर्फ सिरोही और जालौर का है।जिले में साक्षरता वृद्धि दर के क्षेत्र में महिलाएं आगे हैं। सरकार की ओर से जारी वर्ष 2011 के आंकड़ों के अनुसार जिले में पुरुष साक्षरता दर कम है। वर्ष 2001  में पुरुष साक्षरता दर 64. 27  प्रतिशत थी।  महिलाओं की साक्षरता दर वर्ष 2001 में 31. 77 प्रतिशत थी।

हालांकि (प्रतापगढ़ )के राज्य यूपी में वर्ष 2001 की तुलना में वर्ष 2011 के आंकड़ों में साक्षरों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2001 में 56.27 प्रतिशत की साक्षरता दर के साथ यूपी में 5.88 करोड़ लोग निरक्षर थे। वहीं 2011 में साक्षरता दर 69.72 प्रतिशत के साथ निरक्षरों की संख्या 5.14 करोड़ रह गई है।

लालगंज:– जिले के लालगंज तहसील के गौखड़ी ग्रामसभा के आदर्श यादव s/o श्री धर्मेंद्र यादव ने यूपी के सर्वश्रेष्ठ पॉलीटेक्निक संस्थान ‘राजकीय पॉलीटेक्निक लखनऊ’ में दाखिला( 2019) लेकर जिले तथा अपने तहसील के साथ- साथ अपने माता- पिता का नाम रोशन किया है।

नोट:– ये अपने तहसील से हाईस्कूल से यूपी के सर्वश्रेष्ठ पॉलीटेक्निक संस्थान ” राजकीय पॉलीटेक्निक लखनऊ ” में दाखिला लेने वाले पहले छात्र हैं।

प्रतापगढ़ के धार्मिक स्थल और पर्यटन स्थल

भक्ति धाम मनगढ़ 

प्रतापगढ़ के कुंडा तहसील मुख्यालय से तीन किलोमीटर दूर भगवान राधा-कृष्ण को समर्पित मनगढ़ भक्तिधाम मंदिर है। यूपी के प्रतापगढ़ जिले में आस्था व भक्ति के कई केंद्र हैं। इसमें कुंडा क्षेत्र का राधा कृष्ण भक्ति का केंद्र भक्ति धाम मनगढ़ है। यह जिले में बना आधुनिक मंदिर है।

भक्ति धाम उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ की मनगढ में बना आधुनिक मन्दिर है। यह मंदिर वास्तुकला का अनोखा उदहारण है। प्रतापगढ़ का यह सबसे लोकप्रिय धार्मिक स्थल एवं पर्यटन स्थल भी है। भक्तिधाम में भगवान श्री कृष्णलीला दर्शन के लिए भक्तों का ताँता लगा रहता है। भक्ति धाम में हर ओर राधे-राधे की गूंज सुनाई पड़ती है। मंदिर की रमणीय बनावट और धाम की राधे-राधे कि गूँज से वातावरण सुंदरता देखते ही बनती है। भक्तिधाम मनगढ़ में श्रीकृष्ण भगवान के जन्मोत्सव परधामको विद्युत झालरों से बखूबी सजाया जाता है और सबसे ज्यादा रमणीय राधा-कृष्ण दरबार दिखाई पड़ता है। धाम पर श्री कृष्ण जन्मोत्सव में सबसे अधिक भीड़ होती है। लाखों की संख्या में लोग जन्मोत्सव आयोजन में ही सम्मिलित होते हैं। हजारों भक्तो का आवागमन भगवान श्री कृष्ण जी के दर्शन के लिए हमेशा बना रहता है। यहाँ आने वाले विदेशी श्रद्धालुओं की संख्या भी काफी ज्यादा है।

भक्ति धाम मनगढ़  की स्थापना

इस मंदिर का निर्माण यहीं पर जन्मे जगदगुरु कृपालु महाराज ने बनवाया था। बगल में उनकी समाधि भी बनी है। कृपालु महाराज का जन्म प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के मनगढ़ गांव में अक्टूबर, 1922 को हुआ।अपनी जन्मस्थली को इन्होंने पावन धाम बना दिया। राधा-कृष्ण के भक्त कृपालु महाराज ने धार्मिक, शैक्षिक और चैरीटेबल संस्था बनायी है, जिसको जगद्गुरु कृपालु परिषद कहा जाता है।

राधा कृष्ण प्रतिमा: भक्तिधाम मानगढ़ मंदिर में मुख्यता राधा कृष्ण कि युगल मूर्ति स्थापित है, जो अत्यंत मनमोहनी है। इसके अतिरिक्त अन्य देवताओ कि मुर्तिया भी है।

भक्ति धाम मनगढ़ कैसे पहुंचें

बाय एयर: यह मंदिर पहुचने के लिए सबसे नजदीक वायु सेवा लखनऊ में स्थित हैं ,जो की 145 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

ट्रेन द्वारा: यहा पहुचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन तथा कुंडा स्टेशन हैं |

सड़क के द्वारा:  यह भक्ति धाम प्रतापगढ़ जिले से 60 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

बेल्हा देवी मंदिर प्रतापगढ़ 

बेल्हा देवी मंदिर: यदि आप प्रतापगढ़ गए और बेल्हा देवी मंदिर नहीं गए तो समझ लीजिये अपने प्रतापगढ़ मंदिर नहीं घुमा।  प्रयागराज और फैजाबाद मार्ग पर सई नदी तट पर स्थित माँ बेल्हा देवी मंदिर तक पहुंचने का बहुत आसान रास्ता है। प्रयागराज और फैजाबाद की ओर से आने वाले भक्त सदर बाजार चौराहे पर उतरकर पश्चिम की ओर गयी रोड से आगे जाकर दाहिने घूम जाये।  लगभग 200 मीटर की दुरी पर माँ का भव्य मंदिर विराजमान है।

प्रतापगढ़ स्थित सई नदी के किनारे पर ऎतिहासिक बेल्हा माई का मंदिर है। जिले के अधिकांश भू-भाग से होकर बहने वाली सई नदी के तट पर नगर की अधिष्ठात्री देवी मां बेल्हा देवी का यह मंदिर स्थित है। सई नदी के तट पर माँ बेल्हा देवी का भव्य मंदिर होने के कारण जिले को बेल्हा अथवा बेल्हा के नाम से भी जाना जाता है।

इस धाम को लेकर कविंदिया है।  एक धार्मिक मान्यता है की राम वनगमन मार्ग (प्रयागराज  -फैजाबाद राजमार्ग )के किनारे सई नदी को त्रेता युग में भगवान राम ने पिता की आज्ञा मानकर वन जाते समय पार किया था।  यंहा उन्होंने आदि शक्ति का पूजन कर अपने संकल्प को पूरा करने की ऊर्जा ली थी।

दूसरी मान्यता यह है की चित्रकूट से अयोध्या लौटते समय भरत ने यंहा रुककर पूजन किया था , और तभी से यह स्थान अस्तित्व में आया।  यह भी मान्यता है की अपने पति भगवान शंकर के अपमान से रुस्ट होकर जाते समय माता गौरी के कमर (बेल) का कुछ भाग सई नदी के किनारे गिर गया था। जिससे जोड़कर इसे बेला कहा जाता है

मंदिर की स्थापना को लेकर पुराणों में कहा गया है कि राजा दक्ष द्वारा कराए जा रहे यज्ञ में सती बगैर बुलाए पहुंच गईं थीं। वहां शिव जी को न देखकर सती ने हवन कुंड में कूदकर जान दे दी। जब शिव जी सती का शव लेकर चले तो विष्णु जी ने चक्र चलाकर उसे खंडित कर दिया था। जहां-जहां सती के शरीर काजो अंग गिरा, वहां देवी मंदिरों की स्थापना कर दी गई। यहां सती का बेला का (कमर) भाग गिरा था। भगवान राम जब वनवास (निर्वासन) के लिए जा रहे थे तब सई नदी के किनारे पर उन्होंने मंदिर में माँ बेल्हा देवी जी का पूजन अर्चन किया था। माता रानी के समक्ष सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद जरूर पूरी होती है।

सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध माँ बेल्हा देवी धाम की स्थापना को लेकर तरह तरह के अलग अलग मत है।  वन जाते समय भगवान श्री राम सई नदी के तट पर रुके थे और उसके बाद आगे बढे।  रामचरित मानस में भी गोस्वामी तुलसी दास ने इसका उल्लेख किया है।  उन्होंने लिखा है की ”सई तीर बसि चले विहाने,श्रृंग्वेरपुर पहुंचे नियराने ” यंही पर भरत से उनका मिलाप हुआ था।  मान्यता है की बेला अधिष्ठात्री देवी मंदिर की स्थापना भगवान् श्री राम ने की थी,और यंहा पर उनके अनुज भरत ने रात्रि विश्राम किया था।  इसे दर्शाने वाला एक पत्थर भी धाम में था।  इसी प्रकार अन्य जनश्रुतिया है।

इतिहास के पन्ने कुछ और कहते है। एम. डी. पी.कालेज के प्राचीन विभाग के प्रो. पीयूषकांत शर्मा का कहना है की चाहमान वंश के राजा पृथवीराज चौहान की बेटी बेला थी।  उसक विवाह इसी क्षेत्र के ब्रम्हा नमक युवक से हुआ था।  बेला के गौने से पहले ही ब्रम्हा की मृत्यु हो गयी तो बेला ने सई नदी के किनारे खुद को सती कर लिया।  इसीलिए इसे सती स्थल या शक्तिपीठ के तौर पर मना जाता है। वास्तु  के नजरिये से मंदिर उत्तर मध्यकाल का प्रतीत होता है।  पुरातात्विक आधार पर भले ही इन तथ्यो के प्रमाण नहीं मिलते है लेकिन आस्था की नजरो से देखे तो माँ बेल्हा क्षेत्रवासियों के दिल में सास की तरह बसी हुई है।  मंदिर से जुड़े पुरावशेष न मिलने के कारण इसका पुरातात्विक निर्धारण अभी तक नहीं हो सका है लेकिन पुरातात्विक विभाग का प्रयास अभी तक जारी है।

शुक्रवार और शनिवार को यंहा मेला लगता है, जिसमे जिले के ही नहीं बल्कि आस पास के कई जिलों के लोग पहुंचकर माँ के दर्शन पूजन करते है।  हजारो श्रद्धालु दर्शन को आते है ,रोट चढ़ाते है , बच्चो का मुंडन करवाते है और निशान भी चढ़ाते है।  बेल्हा मंदिर बाद में जान भाषा में बेल्हा हो गया और यही शहर का नाम भी पड़ गया।

बेल्हा देवी मंदिर कैसे पहुंचा जाये

हवाई मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा लखनऊ में है, जो प्रतापगढ़ से 180 किमी दूर है।

ट्रेन द्वारा: निकटतम रेलवे स्टेशन प्रतापगढ़ जंक्शन है, जो बेला से 2 किमी दूर है।

सड़क मार्ग से: यह प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किमी दूर है और प्रतापगढ़ बस स्टेशन से लगभग बराबर है।

घुइसरनाथ (घुश्मेश्वरनाथ) धाम)

घुइसरनाथ धाम प्रतापगढ़ 

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में सई नदी के किनारे घुइसरनाथ धाम के नाम से विश्व प्रसिद्ध शिवालय है। धार्मिक और अध्यात्मिक और पौराणिक विशिष्टता के कारण यह शिव धाम करोड़ो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भगवान है।  घुश्मेश्वर जी का यह धाम बाबा घुइसरनाथ धाम नाम से मानव समाज के प्राण में बस गया है। यहाँ भगवान घुश्मेश्वरज्योतिर्लिंग का बहुत विशाल मंदिर है। अवध के उत्तरी क्षेत्र बेल्हा में घुइसरनाथ धाम में स्थित बाबा घुश्मेश्वर नाथ मंदिर भारत के जागृत 12 ज्योतिर्लिंग में अति महत्वपूर्ण है। ज्योतिर्लिंग के बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में बाबा घुश्मेश्वर नाथ की प्रसिद्ध सम्पूर्ण अवध में है। जिस आस्था श्रद्धा विश्वास के साथ यहां आने वाले श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। बाबा घुइसरनाथ धाम में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। भगवान घुश्मेश्वर नाथ जी सबके मन प्राण आत्मा व चेतना को जागृत कर देने वाले महादेव है, उनकी आराधना पूजा साधना मनुष्य को कल्याण कारी तत्वों से भर देती है। सई नदी के पावन तट के किनारे स्थित बाबा घुश्मेश्वर नाथ मन्दिर के आस्था का जन सैलाब, एक दूसरे को सहयोग करता उमड़ता रहता है। बाबा घुश्मेश्वर नाथ का महत्व हमारे धर्म ग्रन्थों व वेदों पुराणों में भी उल्लेखित है। साधक और ज्ञानियों की चेतना के केन्द्र में शिव आदि काल से उपस्थित है। भोले बाबा का विश्लेषण वैदिक काल से अब तक लगातार किया जा रहा है फिर भी पूरा नहीं हुआ है, हो भी नहीं सकता है। भोले बाबा अनादि अनंत अविनाशी है।

घुइसरनाथ का इतिहास 

यहां स्थापित शिवलिंग के बारे में शिव महापुराण में कथा भी वर्णित है और जनश्रुति है कि भगवान राम जब अयोध्या से वनवास के लिए निकले थे तब इस स्थान पर उन्होंने विश्राम किया था। शिव महापुराण के अनुसार, घुश्मा नाम की ब्राम्हण विदुषी महिला ने शिवलिंग की वर्षो तक तपस्या कर प्रसन्न किया था। भगवान शिव शंकर ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए और घुश्मा के मर चुके पुत्र को जिंदा कर दिया था। जिस स्थान पर शिव प्रकट हुये थे वहां स्वयंभू शिवलिंग उत्पन हो गया जो घुश्मा के नाम से ही घुश्मेश्वर नाथ के नाम से जाना गया। हालांकि अब इसका नाम घुइसरनाथ धाम के नाम से प्रचलित हो गया है।

घुइसू अहीर से घुइसरनाथ की कथा 

घुश्मेश्वरनाथ का नाम घुइसरनाथ धाम पड़ने के पीछे भी एक अलग किवदंती यहां प्रचलित है। जिसके अनुसार कालांतर में यह शिवलिंग पृथ्वी में समाहित हो गया और एक टीले के रूप में बदल गया। यहां सई नदी के किनारे तब एक इलापुर (अब कुम्भापुर) नामक गांव था। यहां के रहने वाले घुइसर यादव रोज इसी शिवलिंग वाले टीले पर एक चमकदार पत्थर पर बैठकर गाय-भैंस चराते और मूंज खूंदते हुए पत्थर को लाठी से ठोंकते हुए समय व्यतीत करते। जनश्रुति है कि एक दिन बारिश के दौरान दिव्या रोशनी के साथ भगवान शंकर प्रकट हुए और लाठी से रोज सिर ठोकने पर प्रसन्न होकर घुइसर को वरदान दिया और तभी से इसका नाम घुइसरनाथ धाम पड़ गया।

यह भी मान्यता दन्त कथा के अनुसार, भगवान राम जब यहां विश्राम के लिए रुके तो उनके पसीने की बूंद से करील पेड़ का जन्म हुआ और तब इस क्षेत्र में यह पेड बहुतायत संख्या में फैलते गए। कहा जाता है कि तुलसीदास के रामचरितमानस में यहां पाए जाने वाले अनोखे पेड़ करील का वर्णन है। इस अलौकिक धाम के बारे में लोगों का विश्वास है कि बाबा घुइसरनाथ सबकी मुराद पूरी करते हैं और इनके धाम से कोई भी खाली हाथ नहीं जाता है।

पुराणों में दर्ज है और जनश्रुति है कि सई नदी पहले बाबा घुइसरनाथ धाम को स्पर्श करते हुए यानी उनके चरणों के पास से गुजरती थी और लोग सई नदी में स्नान के बाद बाबा के दर्शन किया करते थे। प्रत्येक वर्ष सावन में यहां पूरे उत्तर प्रदेश से लोगों का कावड़ में जल लेकर आने व बाबा को स्नान कराने का क्रम चलता है और लाखों श्रद्धालुओं को यह दिव्य स्थल अपनी ओर आकर्षित करता हैं। घुइसरनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं व सुखसमृद्धि की प्राप्ति होती है। बाबा हर रूप में, हर रंग में करते हैं भक्तों का कल्याण, वो न सिर्फ देते हैं भक्तों को वरदान बल्कि अनिष्ट की आशंका से भी सावधान करते हैं |घुश्मेश्वर नाथ धाम प्रतापगढ़ के लालगंज अजहारा ज़िले में स्थित है। असल में इस शहर को हमेशा इस मंदिर की वजह से एक तीर्थस्थान की तरह देखा गया है।

घुइसरनाथ धाम प्रतापगढ़ कैसे पहुंचें

बाय एयर

यह मंदिर पहुचने के लिए सबसे नजदीक वायु सेवा लखनऊ में स्थित हैं ,जो की प्रतापगढ़ जिले से 180 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

ट्रेन द्वारा

यह मंदिर प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन से 35 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |.

सड़क के द्वारा

यह मंदिर प्रतापगढ़ बस स्टेशन से 35 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |.

पौराणिक शनि मंदिर प्रतापगढ़

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक प्राचीन शनिदेव का मंदिर स्थित है। प्रतापगढ़ जिले के विश्वनाथगंज बाजार से लगभग २ किलो मीटर दूर कुशफरा के जंगल में भगवान शनि का प्राचीन पौराणिक मन्दिर लोगों के लिए श्रद्धा और आस्था के केंद्र हैं।  ऐसी मान्‍यता है कि यहां पर केवल दर्शन मात्र करने से ही शनिदेव की कृपा बरसती हैं। ये अवध क्षेत्र के एक मात्र पौराणिक शनि धाम होने के कारण भी अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण माना जाता है। प्रत्येक शनिवार को इस मंदिर में 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। यह धाम बाल्कुनी नदी के किनारे स्थित है। जो की अब बकुलाही नाम से भी जानी जाती है। अवध क्षेत्र के एक मात्र पौराणिक शनि धाम होने के कारण प्रतापगढ़ (बेल्हा) के साथ-साथ कई जिलों के भक्त आते हैं।

पौराणिक शनि मंदिर का इतिहास

इस मन्दिर के संदर्भ में अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य प्राप्त होते हैं जो इसके चमत्कारों की गाथा और इसके प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा को दर्शाते हैं। मंदिर के विषय में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं जिसमें से एक मान्यता अनुसार कहा जाता है की शनि भगवान कि प्रतिमा स्वयंभू है, जो कि कुश्फारा के जंगल में एक ऊँचे टीले पर गड़ा पाया गया था। मंदिर के महंथ स्वामी परमा महाराज ने शनि कि प्रतिमा खोज कर मंदिर का निर्माण कराया।

श्री यंत्र जैसी है बनावट

ये शनि धाम कुछ इस तरह बना है कि एक श्री यंत्र की तरह हो गया है। इसके दक्षिण की तरफ प्रयाग, उत्तर की तरफ अयोध्या, पूर्व की ओर काशी और पश्चिम में तीर्थ गंगा स्वर्गलोक कड़े मानिकपुर है। मानिकपुर मां शीतला का सिद्धपीठ मंदिर है। शनि मंदिर के विषय में कई कथायें प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार यहां पर शनिदेव की प्रतिमा स्वयंभू है। जो कुश्फारा के जंगल में एक ऊंचे टीले में दबी थी। जहां से महंत स्वामी परमा महाराज ने इसको खोज कर मंदिर का निर्माण करवाया था।

शनिवार का मेला

इस मंदिर में प्रत्येक शनिवार को भक्तों की भीड़ उमड़ती है, और यहां भव्य मेला लगता है। इसके साथ ही हर साल अखंड राम नाम जप का वार्षिकोत्सव भी आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जो सुबह से लेकर रात तक चलता है। इस अवसर पर पूरे मंदिर और शनिदेव की प्रतिमा को फूलों से सज्‍जित किया जाता है।

पौराणिक शनि मंदिर कैसे पहुंचें

बाय एयर:  यह मंदिर पहुचने के लिए सबसे नजदीक वायु सेवा लखनऊ में स्थित हैं ,जो की प्रतापगढ़ जिले से 180 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

ट्रेन द्वारा: यह मंदिर प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन से 15 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

सड़क के द्वारा:  यह मंदिर प्रतापगढ़ बस स्टेशन से 15 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

चंदिकन देवी मंदिर प्रतापगढ़

प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम के कोने पर मां चंद्रिका देवी का मंदिर है। भगवती चंद्रिका देवी का मंदिर प्रतापगढ़-अठेहा मुख्य सड़क पर स्थित है। यह मंदिर माँ चंडिका देवी को समर्पित है, माता रानी के धाम को माँ चंदिकन धाम से जाना जाता है।यह धाम जनपद की धार्मिक पहचान भी है। सिद्ध पीठ मां चण्डिका देवी धाम में मां की मूर्ति वैष्णों माता से मिलती है। वैष्णों धाम के बाद तीन पिंडी मूर्ति चण्डिका में ही है। यहां से किसी भी भक्त को खाली हाथ नहीं लौटना पड़ा है। मां सबकी मन्नतें पूरी करती हैं।

चंदिकन देवी मंदिर का इतिहास

चंदिकन देवी: हालांकि एक लोककथा जरूर प्रचलित है। उसके अनुसार स्थानीय संडवा गांव की दो बहनें चंद्रिका और कालिका, जिन्हें देवी की सिद्धि प्राप्त थी, में से चंद्रिका ने इस स्थान को अपना सिद्धि स्थल बनाया जबकि दूसरी बहन कालिका के नाम पर अमेठी जनपद में धाम है। सिद्धि स्थल होने के कारण यह धाम चंद्रिका धाम के नाम से मशहूर है। मुरादें पूरी होने पर श्रद्धालुओं ने मंदिर का विस्तार कराया। मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह वैदिक काल से ही है। गर्भगृह पर बने मंदिर की दीवारों की चौड़ाई एक मीटर से भी अधिक है। बताते हैं कि पहले यहां केवल गर्भगृह ही था। प्रत्येक वर्ष चैत्र माह (फरवरी-मार्च) और अश्विन (सितम्बर-अक्टूबर) माह मेंचन्द्रिका देवी मेले का आयोजन किया जाता है। हजारों की संख्या में लोग इसमेले में सम्मिलित होते हैं। चंदिकन देवी मंदिर पर नवरात्र में सबसे अधिक भीड़ होती है। यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

भक्तों की आस्था की प्रतीक मां चंद्रिका देवी की मान्यता के पीछे कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि ठोस पौराणिक आधार है। यही कारण है कि न सिर्फ नवरात्र बल्कि प्रत्येक मंगलवार को यहां श्रद्धालुओ  की भारी भीड़ उमड़ती है। इस धाम का उल्लेख भागवत में मिलता है। उक्त ग्रंथ में सई का पूर्व नाम चंडिका और इसके उत्तर में इस धाम के मौजूद होने का उल्लेख है। कोल का बड़ा नाला इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में सई नदी इस धाम के समीप ही बहती थी। देवी भागवत में ही यहां विद्यमान मां चंद्रिका को मां पार्वती का विवाहित स्त्री रूप माना गया है। इससे यहां सिंदूर आदि चढ़ता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने छोटे भाई लक्ष्मण तथा जानकी के साथ इसी मार्ग से वन गमन किया था।

भीड़ को नियंत्रितकरने के लिए मंदिर में बैरीकेटिंग की गई जिससे श्रद्धालुओं को दिक्कत न हो।

किसान देवता मंदिर प्रतापगढ़ 

विश्व का प्रथम किसान देवता मंदिर: किसान देवता मंदिर प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के सराय महेश ग्राम में निर्मित है। यूपी के प्रतापगढ़ जिले में किसानों की पूजा होती है। सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन यह सच है. दुनिया में  पहली बार किसान मंदिर बनाया गया है, जहां बकायदा किसानों को देवता मानकर उनकी पूजा की जाती है. किसानों का मनोबल बढ़ाने के मद्देनजर यह अनूठी कोशिश यहां के निवासी योगीराज ने की है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यह किसी एक धर्म या संप्रदाय का मंदिर नहीं बल्कि किसान देवता के नाम से एक ऐसा धार्मिक संस्थान है जहां किसी भी धर्म व संप्रदाय के लोग आ सकते हैं।यहां आने से किसानों के सारे दुख दर्द दूर होते हैं और उनके खेती में बरकत होती है।

योगीराज महाराज ने किसान को सम्‍मान दिलाने के मकसद से अपने गांव में किसान देवता मंदिर बनवाकर एक मिसाल पेश की है. योगीराज का कहना है कि वो किसानों की बदहाली से इतने भावुक हुए थे कि उन्होंने किसानों के कार्य को दुनिया के सामने लाने के लिए यह अनोखा अभियान छेड़ दिया.

योगीराज का कहना है कि उनकी ये कोशिश धीरे-धीरे ही सही रंग ला रही है.  लोग  किसान देवता मंदिर मे माथा टेकने आते हैं उनका शुक्रिया अदा करते हैं. मंदिर के साथ ही योगिराज ने किसानों की आराधना के लिए किसान चालीसा भी लिखी है. वे लगातार इस चालीसा का वितरण कर रहे हैं.

हर सोमवार को किसान देवता मंदिर के बाहर भंडारा लगाया जाता है, जहां सैकड़ों लोगो का पेट भरता है। योगिराज के बेटे सक्षम भी इस मुहिम से प्रभावित हैं और अपने जैसे युवाओं को किसान आंदोलन से जोड़ रहे हैं.

2015 से शुरू किया मंदिर; पेशे से चिकित्सीय कार्य करने वाले योगिराज सरकार का बताते हैं, मैं बचपन में जब कथा सुनता था तब उसमें ग्राम्य देवता का उल्लेख हुआ करता था लेकिन कहीं उनका मंदिर वगैरह नही देखता था। थोड़ा समझदार हुआ तो पता चला जो अन्नदाता हैं उन्ही के लिए ग्राम्य देवता का उल्लेख है। ऐसे में जब मेरे पास संसाधन हुआ तो मैंने 2015 में किसान देवता का मंदिर बनाया। साथ ही किसान पीठाधीश्वर की स्थापना की।

क्या है उद्देश्य:  योगिराज कहते हैं कि हमारे शास्त्रों के अनुसार किसान सबका भरण पोषण करता है। इसलिए उसे देवता तुल्य माना गया है। किसान कठिन मेहनत करके धरती को उपजाऊ बनाता है। किसान देवता के मंदिर की परिकल्पना यही है कि हमारे किसान को भी वह सम्मान मिले जो अन्य देवताओं को मिलता है। किसान की दशा इस समय खराब है। ऐसे में किसान को देव तुल्य सम्मान मिलना चाहिए। यही शास्त्रों और पुराणों में भी लिखा हुआ है।

माँ पंचमुखी मंदिर प्रतापगढ़ 

जिला कचेहरी से भंगवा चुंगी रोड़ पर लोहिया पार्क के पास माँ पंचमुखी मंदिर स्थित है जो काफी प्रसिद्ध धार्मिक, ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल है। यहाँ देवी जी की जो प्रतिमा है वो पांच मुंह वाली है जिसका तेज देखते ही बनता है। यहाँ पर हर मुराद माँ देवी अवश्य पूरी करती हैं। ऐतिहासिक धरोहर, मनोकामना सिद्धि और एकता का प्रतीक है यह मंदिर, जिसकी सुंदर छवि देख कर ही मन प्रसन्न हो उठता है और हृदय में आनंद की अनुभूति होती है। आप सभी हमारे साथ जुड़ कर इस मंदिर के कायाकल्प में हमारा सहयोग देकर ईश्वर की अनुकम्पा और अपनी इच्छा पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करें।

भयहरणनाथ धाम प्रतापगढ़ 

भयहरणनाथ धाम प्रतापगढ़: बाबा भयहरणनाथ मन्दिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मन्दिर हैं।प्रसिद्ध धार्मिक, ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल भयहरणनाथ धाम जनपद प्रतापगढ़ के मुख्यालय के दक्षिण लगभग 30  किलोमीटर पर स्थित है अपनी प्राकृतिक एवं अनुपम छटा तथा बकुलाही नदी के तट पर स्थित होने के कारण यह स्थल आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त जीवन्त है। श्रावण मास, मलमास, अधिमास तथा महाशिवरात्रि को जनमानस की अपार भीड़ देखने को मिलती है, वैसे वर्ष भर प्रत्येक मंगलवार को भारी भीड़ होती है तथा जलाभिषेक एवं पताका चढता है। प्रत्येक अवसर पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मिष्ठान, विसात, फल सब्जी, फूल माला तथा अन्य वस्तुओं की दुकाने सजी रहती हैं।

1857 स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन एवं विद्रोह प्रतापगढ़ 

स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में प्रतापगढ़ का योगदान: ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लगभग डेढ़ सौ साल पहले 19वीं सदी के मध्य इस कस्बे की स्थापना महान स्वतंत्रता सेनानी एवं तिरोल रियासत के सूबेदार बाबू गुलाब सिंह ( Babu Gulab Singh Pratapgarh ) जी ने की थी। 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रजी सेना ने स्थानीय विद्रोह का दमन करने के लिए जब तिरोल पर आक्रमण किया तो बाबू गुलाब सिंह एवं उनके भाई बाबू मेदनी सिंह ( Babu Medani Singh ) ने बकुलाही नदी ( Bakunahi river ) के किनारे अंग्रेजों के साथ घमासान युद्ध किया। इस लड़ाई में कई अंग्रेज मारे गए और उनके शरीर से निकलने वाले रक्त से बकूलाही नदी का पानी लाल पड़ गया था। निश्चय ही वह एक ऐतिहासिक दिन था। इस मुठभेड़ में कई गोलियां बाबू गुलाब सिंह को भी लगीं। इलाज के अभाव में तीसरे दिन वह सदैव के लिए अमरगति को प्राप्त हुए।

भयहरण नाथ धाम प्रतापगढ़

महाभारत काल में प्रतापगढ़: महाभारत के वन पर्व में उल्लेख प्राप्त होता है कि दुर्योधन से जुए में हारने के पश्चात युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ वनवास को चले गए। जिसमें एक वर्ष उन्हें लोगों से छिपकर अज्ञातवास करना था। इसी दौरान पांडव अपनी पहचान छिपाते हुए प्रतापगढ़ के घने जंगलों में आ पहुंचे जिसे द्वैत वन के नाम से जाना जाता था। कथा के अनुसार उस समय राक्षस बकासुर का यहां पर भय व्याप्त था। स्थानीय लोग असुर का भोजन बनने से स्वयं को बचाने के लिए प्रतिदिन उसके लिए खाद्य सामग्री का प्रबंध करते थे। माता कुंती के कहने पर पांडवों में सर्वाधिक शक्तिशाली भीम ने पास में स्थित उचडीहा नामक स्थान पर बकासुर का वध किया एवं आसपास रहने वाले लोगों को इस भय से सदैव के लिए मुक्त कराया। तत्पश्चात बकुलाही नदी के तट पर भीम ने अपना एवं स्थानीय निवासियों का मनोबल एवं उत्साह बढाने के लिए पत्थरों को तराश कर शिवलिंग की स्थापना की । इसके बाद पांडव यहाँ से नेपाल के विराट नगर की ओर चले गए। कालांतर में इसी शिवलिंग को केंद्र में रखते हुए यहां निवास करने वाले एक नागा साधु ने स्थानीय लोगों के सहयोग से इस मंदिर का निर्माण करवाया। चूंकि भीम ने बकासुर का वध करके लोगों के भय का हरण किया था अतः जनमत के अनुसार इसका नाम ”भयहरण नाथ धाम” ( Bhayaharan nath dham )पड़ा।

लगभग 10 एकड के क्षेत्रफल में फैले इस धाम में पाण्डवों द्वारा स्थापित शिवलिंग के मुख्य मन्दिर के अलावा हनुमान, शिव पार्वती, संतोषी माँ, राधा कृष्ण, विश्वकर्मा भगवान, बैजूबाबा आदि का मंदिर है। अपनी प्राकृतिक एवं अनुपम छटा तथा बकुलाही नदी के तट पर स्थित होने के नाते यह स्थल आध्यात्मिक दृष्टि से काफी जीवन्त है।

कथा

।। भीम बकासुर की हुई लड़ाई। तुम्हरे बल तेहि स्वर्ग पठाई।।

।। पांडव पर अति किरपा कीन्हा। अतिसय बल औ पुरुख दीन्हा।।

।। तब बल भीम हिडिम्बहि मारा। कीन्ह द्वेतवनन निर्भय सारा।।

महाभारत के वन पर्व में एक कथा है जिसके अनुसार कौरवों से जुए में हारने के बाद युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ वनवास को चले गए। जुए में शर्त के अनुसार इनको एक वर्ष अज्ञातवास करना था। अज्ञातवास करने के लिए पाण्डव छिपते हुए प्रतापगढ़ के निकट सघन वन क्षेत्र द्वैत वन में आ गए। यहां पांचो पांडवों ने भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए अलग-अलग स्थानों पर शिवलिंग स्थापित किए। बताते हैं, धर्मराज युधिष्ठिर ने प्रतापगढ़ के रानीगंज अजगरा में अजगर रूपी राक्षस का वध किया था। आज भी यहाँ पाँच सिद्ध स्थान है जो पांडवों ने स्थापित किये थे। बाद में पांडव नेपाल के विराट नगर चले गए। महाभारत में बालकुनी नदी का उल्लेख हुआ है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार बालकुनी का अपभ्रंश बकुलाही हो गया। वर्तमान की बकुलाही नदी के तट पर भगवान भयहरणनाथ लिंग रूप में विराजमान है।

बार बार विनती करूँ, सुनहु भयहरण नाथ।

दया दृष्टि कीजै प्रभु, बसहु हृदय मम नाथ।।

दीनबन्धु करूणा अयन, कृपा सिन्धु सुख धाम।

ऐसे भोलेनाथ को, बारम्बार प्रणाम।।

बार बार सेवक करे, विनय भयहरण नाथ।

भक्ति विमल प्रभु दीजिये, कहु दया अब नाथ।।

भक्त भला प्रभु कीजिये, पूरण कीजै आस।

परम पातकी हुँ सरल, कीजै नही निरास

मंदिर की बनावट—-मुख्य मंदिर एक ऊँचे टीले पर बना हुआ है। मंदिर मे मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारो ओर प्रदक्षिणा पथ है। मुख्य मंदिर के बाहर प्रांगण मे नंदी बैल भगवान शिव के वाहन के रूप मे विराजमान है। मुख्य मंदिर के सामने बारादरी से जुड़ा हुआ शंकर पार्वती की सदेह मूर्ति है, जिसका निर्माण 7 नवम्बर 1960 को कुर्मी क्षत्रिय समाज द्वारा किया गया था। धाम मे मुख्यतः दस मंदिर है और तीन समाधिया है। यहाँ की कुछ मंदिर उपेक्षित भी है। मंदिर का वास्तुशिल्प निर्माण उत्तर भारत वास्तुकला के आधार पर हुआ है। हिंदू वास्तुशास्त अनुसार प्रत्येक मंदिर का मुख पूरब सूर्योदय की दिशा मे है।

प्रतापगढ़ की प्रसिद्द समाधियाँ

यहाँ मुख्यत: तीन समाधि है।

प्रथम समाधि

प्रथम समाधि है मंदिर के प्रथम पुजारी एवं जीर्णोद्धारक पूज्यनीय संत श्री नागा बाबा की। ब्रह्मलीन नागा बाबा ने जन सहयोग से भवभयहरणनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। वर्तमान मंदिर नागा बाबा के परिश्रम की देन है। इनके संबंध मे बहुत लोक कथाएँ प्रचलित है। महापुरुष संत आज भी स्थानीय लोगो के हृदय में बसते हैं।

द्वितीय समाधि

द्वितीय समाधि है ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री दाण्डी महाराज की। स्वर्गीय दाण्डी स्वामी ने भी इस धाम के विकास एवं संरक्षण के लिए बहुत कुछ प्रयास किया था। स्वामी श्री ने अपना संपूर्ण जीवन भगवान भोलेनाथ की सेवा मे समर्पित कर दिये थे।

तृतीय समाधि

धाम के प्रांगण मे स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर के सामने एक छोटा सा मंदिर है, जो एक बंदर की समाधि है। इसके संबंध में बताया जाता है कि कटरा गुलाब सिंह बाज़ार मे एक जोड़ा बंदर रहता था। एक दिन एक व्यक्ति ने बाट से बंदरिया को मार दिया, दुर्योग ही कहा जाएगा, वह बंदरिया मर गई। बाज़ार वासी उस व्यक्ति को बहुत भला बुरा कहे फिर राय बनाकर उसकी अन्तयेष्टि गंगा जी के तट पर करने का निश्चय किया। शव यात्रा निकली, साथ मे नर बंदर भी आगे आगे चला। लोगों ने सोचा, जिस मार्ग से बंदर चले उसी मार्ग से चला जाए। बंदर बाज़ार से बाहर निकलने पर बाबा नगरी भयहरणनाथ धाम की ओर मुड़ गया। सभी लोग तट पर जाने के बजाय उसी बंदर का अनु गमन करते हुए बाबा नगरी पहुँच गए। बंदर पहले प्रधान मंदिर भगवान भव भयहरणनाथ महादेव के सामने पहुँच कर बैठ गया। इसके बाद उठकर राधाकृष्ण मंदिर के सामने बैठा। लोगों ने उसके मौन संकेत को समझकर उसी स्थान पर बंदरिया की समाधि बना दी। कुछ दिन बाद मारने वाला परिवार परेशान होने लगा। बाज़ार वासियों ने उसे बंदरिया की पक्की समाधि बनाने की सलाह दी। उसने अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया लोगों के अनुसार तभी से उस परिवार का कल्याण हो गया।

वार्षिक महोत्सव

पिछले गत वर्षों से महाशिवरात्रि पर चार द्विवसीय महाकाल महोत्सव, नागपंचमी पर घुघुरी उत्सव ने परम्परा का स्वरूप ग्रहण करके इस धाम का महत्व राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित किया है। इस धाम पर देश विदेश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों का विभिन्न कार्यक्रमों में आगमन होता रहता है।

भयहरणनाथ धाम की महिमा

बाबा भयहरणनाथ महादेव की बड़ी महिमा है। यहाँ महादेव को भवभयहारी कहा गया है। प्रतापगढ़ ज़िले का पंचधाम (भयहरणनाथ धाम, घुइसरनाथ धाम, बेलखरनाथ धाम, हौदेश्वरनाथ धाम, बालेश्वरनाथ धाम) – ये पाँच प्रधान तीर्थ है, इन पंच शिवलिंग के दर्शन का बड़ा ही माहात्म्य है। भयहरणनाथ बाबा के संबंध मे भक्तो की गहरी आस्था है कि भयहरणनाथ महादेव भक्तों के भय, दुःख, व्याधि दूर कर सुख, समृद्धि और वैभव प्रदान करते है। भयहरणनाथ धाम मंदिर के दर्शन पाकर सभी भक्त आत्मिक शांति को पाते हैं इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही सभी कष्ट, कलेश दूर हो जाते हैं। भक्तों का अटूट विश्वास इस स्थान की महत्ता को दर्शाता है।

भयहरणनाथ धाम कैसे पहुंचें

प्रतापगढ़ ( Pratapgarh ) घंटाघर ( Ghantaghar ) से 7.5 किलोमीटर दूर दक्षिण की ओर रायबरेली राजमार्ग पर स्थित है कटरा मेदनीगंज चौराहा ( Katra Medniganj Chahuraha )। यहाँ से 12 किलोमीटर आगे मौजूद है- मान्धाता ( Mandhata ) विकास खंड। जहां से दक्षिण की ओर 10 किलोमीटर आगे बसा हुआ है एक छोटा सा ऐतिहासिक कस्बा- कटरा गुलाब सिंह ( Katra Gulab Singh )।

बाय एयर

यह मंदिर पहुचने के लिए सबसे नजदीक वायु सेवा लखनऊ में स्थित हैं ,जो की प्रतापगढ़ जिले से 180 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

ट्रेन द्वारा

यह मंदिर प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन से 32 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

सड़क के द्वारा

यह मंदिर प्रतापगढ़ बस स्टेशन से 32 कि० मी० की दूरी पर स्थित हैं |

हौदेश्वर नाथ धाम प्रतापगढ़ 

बाबा हौदेश्वरनाथ धाम उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के कुण्डा तहसील मुख्यालय से 12 किलोमीटर दक्षिण दिशा में माँ गंगा के पावनतट पर स्थित एक पुरातन मंदिर है। धाम के बगल से अनवरत बहने वाली गंगा नदी का नाम यहीं से जाह्नवी पड़ा है। मलमास में भक्तों की भारी भीड़ लगती है। दूर दराज से शिव भक्त मंदिर में जलाभिषेक करने आतें हैं। बाबा हौदेश्वरनाथ धाम पर राजा भगीरथ ने भी पूजा की थी। सावन माह के अलावा प्रत्येक सोमवार को यहां दर्शन के लिए हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ती है। भक्त गंगा स्नान के साथ बाबा हौदेश्वरनाथ को जलाभिषेक कर मन्नतें मांगते हैं तथा मन्नत पूरी होने पर निशान, रोट आदि चढ़ाते रहते हैं।

हौदेश्वर नाथ धाम की पौराणिक कथा

“हौदे से प्रगटे हौदेश्वर नाथ ।

जो अवधेश्वर कहलाये थे ।।

यहीं गंगा भई जान्हवी ।

भागीरथ भोले को धयाये थे ।।

हौदेश्वर नाथ धाम का इतिहास 

बाबा हौदेश्वरनाथ मंदिर से जुड़ी कई किंवदन्तियां हैं जब महाराज भगीरथ ने भोले नाथ की घोर तपस्या से उन्हें प्रसन्न कर वरदान स्वरूप माँ गंगा को लेकर जा रहे थे तो हौदेश्वर धाम से तीन किलोमीटर पश्चिम वर्तमान में करेंटी घाट के पास जाह्नवी ऋषि तपस्या में लीन थे। गंगा की तेज़ धारा का गर्जन सुनकर उनकी तपस्या भंग हो गयी। नाराज ऋषि ने गंगा का पान कर लिया। हताश भगीरथ ने शिवलिंग की स्थापना कर वर्तमान में शाहपुर गांव के पास पुन: घोर तपस्या प्रारम्भ की। यहां पर उन्होंने वेदी का निर्माण किया और तपस्या और हवन-यज्ञ किया। कालान्तर में इस वेदी का नाम बेंती पड़ गया। इसके पश्चात् घोर तपस्या से प्रसन्न शिव जी ने पुन: दर्शन देकर बताया कि माँ गंगा का जाह्नवी ऋषि ने पान कर लिया है। ऋषि की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करो और गंगा को अपने साथ लेकर जाओ। भगीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न ऋषि ने सोचा कि यदि गंगा को अपने मुख से बाहर निकालता हूं तो गंगा जूठी हो जायेंगी । तब ऋषिवर ने अपनी जंघा चीरकर माँ गंगा को बाहर निकाला। इसके पश्चात् उन्होंने बताया कि इस स्थान से 5 किलो मीटर तक गंगा को जाह्नवी के नाम से जाना जाएगा। आज यह स्थान हौदेश्वर नाथ धाम के नाम से जनपद में विख्यात है।

बाबा बेलखरनाथ धाम प्रतापगढ़ 

बाबा बेलखरनाथ मन्दिर (धाम) उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद मे सई नदी के तट पर स्थित हैं। बाबा बेलखरनाथ धाम प्रतापगढ़ मुख्यालय से 15  किलोमीटर पट्टी मार्ग पर लगभग 90  मीटर ऊँचे टीले पर सई नदी के किनारे स्थित बाबा बेलखरनाथ धाम बेलखरिया राजपूतों के इतिहास को समेटे हुए हैं। यह स्थल ग्राम अहियापुर में स्थित है। वर्ष में एक बार महाशिवरात्रि पर्व पर व् प्रत्येक तीसरे वर्ष मलमास में यहाँ 1  महीने तक विशाल मेला चलता है जिसमे कई जिलो से शिवभक्त व संत महात्मा यहाँ आकर पूजन प्रवचन किया करते हैं। प्रत्येक शनिवार को यहाँ हजारो की संख्या में पहुचने वाले श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना किया करते है। वनगमन के समय राजा बेलनृपति के शासनकाल में भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित बाबा बेलखरनाथ धाम आज भी अपनी पौराणिक मान्यता के साथ ही ऐतिहासिक धरोहर को समेटे हुए हैं। मान्यता है कि राजा बेल के नाम से प्रसिद्ध इस शिवलिंग के समक्ष सच्चे मनसे मांगी गई मुराद जरूर पूरी होती है।इस धाम में रुद्राभिषेक मुख्य रूप से होता है। विश्वास है कि इससे बांझ महिला को पुत्र की प्राप्ति होती है और काल सर्प दोष का नाश होता है। दीवानगंज बाजार से लगभग तीन किमी दक्षिण की तरफ एक विशाल टीले पर यह पवित्र शिवधाम स्थापित है।

बाबा बेलखरनाथ धाम इतिहास

बाबा बेलखरनाथ मंदिर का नाम बिलखरिया राजपूतो के नाम पर पड़ा। कई दशकों पहले सई नदी के किनारे की उपजाऊ जमीन पर ऋषिवंश के दिक्खित वंश कश्यप गोत्र के बिलखरिया राजपूतों का एक छत्र राज्य था। बिलखरिया राजपूतों का मूल उद्गम राजस्थान या बिहार के आसपास की कोई जगह मानी जाती है।  हालांकि इसके पीछे कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पाया है कि बिलखरिया राजपूत इतनी दूर से परगना पट्टी में किस उद्देश्य से आए थे।  कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजस्थान के किसी प्रांत में भयानक सूखा पड़ने के कारण बिलखरिया राजपूतों को वहां से पलायन करना पड़ा।  सूखे की त्रासदी झेलने के बाद उन्होंने तय किया कि अब वह उसी जगह निवास करेंगे जहां पर कोई नदी बहती हो।  कुछ समय उन्होंने इलाहाबाद के किसी भाग में गंगा नदी के किनारे वास किया किंतु वर्षा के समय गंगा नदी में आने वाली बाढ़ के कारण उन्हें फिर से पलायन करना पड़ा।  आखिरकार उन्होंने सईं नदी के किनारे एक ऊँचे टीले पर अपना निवास स्थापित किया।  यहाँ पर न तो सूखा पड़ने की संभावना थी और न ही बाढ़ आने की। बिलखरिया राजपूतों ने बेलखरनाथ कोट का निर्माण कराया। जिसका खंडहर आज भी मौजूद है।

बिलखरिया राज्य के विनाश के बाद इस किले तथा शंकर जी के स्थान पर जंगल बन गया जहाँ लोग लकड़ी काटने जाया करते थे। एक दिन एक व्यक्ति की नजर शिव जी पर पड़ी तो उसने पत्थर समझ कर शिवलिंग पर अपनी कुल्हाड़ी तेज करना शुरू कर दिया और पत्थर पर कुल्हाड़ी मार दी जिसका निशान आज भी मौजूद है उस व्यक्ति को बिजली सा झटका लगा और वो बेहोश हो गया। उसके कानो में डमरू की आवाज सुनाई दी साथ ही वह गूंगा और बहरा हो गया। इसके बाद उसने साईं नदी में स्नान कर शिव स्थान पर पूजा शुरू कर दी। मंदिर बनने से पहले वहाँ पर अरघा का टुटा हुआ भाग विद्यमान था। उसी समय भगतो ने शिवलिंग के ऊपर छप्पर बना दिया बाद में भगवान शिव की प्रेरणा से राजा दिलीपपुर द्वारा वहाँ छत का निर्माण कराया गया। कालांतर में राजा दिलीपपुर ने कई बार मंदिर बनवाने का प्रयास किया। दिन में तो मंदिर बनती पर दूसरे दिन मंदिर गायब रहती। लोग हैरान थे कि ऐसा क्यूँ हो रहा है। इसी बीच गांव के निवासी ब्रह्मार्षि शिव हर्ष ब्रह्माचारी ने तीन पीढि़यों के द्वारा मंदिर का निर्माण करवाया था।

वर्ष 1916 में छपी पुस्तक वस्तु गोत्र चौहान बंश छंदों में रचित एक ग्रन्थ है। जिसमे लिखा है कि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के समय बेल नृपति के शासनकाल में बेलखरनाथ महादेव की पूजा की थी।

अन्य मंदिर

धाम परिसर में राम, जानकी, हनुमान जी और विश्वकर्मा भगवान के मंदिरों के साथ ही कई धर्मशालाएं और सराय का भी निर्माण किया गया है। पीपल के वृक्षों से आच्छादित मंदिर परिसर तक सीढ़ी नुमा रास्ते और चारों तरफ फैला जंगल इसकी शोभा में चार चांद लगा रहे हैं।

कांवरियों से गुलजार धाम 

कांवरियों से गुलजार धाम प्रतापगढ़: बाबा बेलखरनाथ धाम सावन में कांवरियों से गुलजार हो जाता है। जौनपुर, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, अमेठी, इलाहाबाद सहित कई जिलों के श्रद्धालु कांवर लेकर बाबा के दुग्ध और जल से अभिषेक के लिए आते हैं। प्रत्येक शनिवार और सोमवार को भी दर्शन पूजन और भंडारा होता है।

शक्तिपीठ मां चौहर्जन धाम

शक्तिपीठ मां चौहर्जन धाम प्रतापगढ़: रानीगंज, प्रतापगढ़ में आदि शक्ति नव दुर्गा के पूजा स्थलों में शक्तिपीठ मां चौहर्जन धाम प्रमुख है। पौराणिक के साथ इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। लोगों का अटूट विश्वास है कि मां के दरबार में जो श्रद्धा से आया वह निराश नहीं रहा। पवित्र मंदिर की ऐतिहासिकता एवं निर्माण काल का वर्णन लोक कथाओं पुराणों एवं किवदंतियों में भी है। लोकमत है कि छठीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण कन्नौज नरेश जयचंद के दो सैनिकों आल्हा और ऊदल ने किया था। यह मंदिर रानीगंज पट्टी मार्ग पर लच्छीपुर बाजार से पश्चिम दिशा में चार किमी की दूरी पर स्थित है। चौहर्जन गांव के कारण यह चौहर्जन देवी के नाम से भी जानी जाती हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु हलवा पूड़ी का प्रसाद चढ़ाते हैं और मुंडन संस्कार कराते हैं।

शक्तिपीठ मां चौहर्जन धाम का इतिहास

बाराही देवी धाम रानीगंज तहसील क्षेत्र के परसरामपुर गांव में ऊंचे टीले पर स्थित है, जो शक्तिपीठों में एक है। अभिलेखों में मां बाराही का वर्णन है। यह प्राचीन मंदिर छठी शताब्दी का है। 1008 महंथ गणपति गिरी ने 1365 विक्रमी संवत में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। यहां आल्हा व ऊदल का कुआं व सुरंग है जो नदी में जा मिली है। मंदिर के पश्चिमी ओर की सुरंग पूरी तरह पट चुकी है तो कुआं भी कूड़ा करकट से पट रहा है, जिससे सुरंग व कुएं का अस्तित्व मिटता जा रहा है। आल्हा-ऊदल इसी कुएं से सुरंग के माध्यम से नदी में स्नान करने व मां बाराही का पूजन करने जाते थे।

पंरपरा

शक्तिपीठ मां चौहर्जन धाम: मां चौहर्जन धाम यहां हर सोमवार और शुक्रवार को मेला लगता है। है। हजारों की संख्या में लोग इसमेले में सम्मिलित होते हैं।धाम पर नवरात्र में सबसे अधिक भीड़ होती है। शीतला सप्तमी और कार्तिक पूर्णिमा पर यहां लाखों इकट्ठा होते है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु हलवा पूड़ी काप्रसाद चढ़ाते हैं और मुंडन संस्कार कराते हैं।

मंदिर में मां के पूजन का कार्य गिरी परिवार करता है। जो सोमवार को अपने नंबर पर श्रद्धालुओं को दर्शन-पूजन कराते हैं। पूर्व प्रधान एवं पुजारी राम अक्षैवर गिरी, रामप्रताप गिरी, विनोद गिरी, जयश्री गिरी, मंतोष, विनय, प्रेमशंकर दादा भाई ने बताया कि बाराही धाम शक्तिपीठ है। माता भक्तों के मन की मुराद पूरी करती हैं।

कोटवा महारानी धाम प्रतापगढ़

जिला मुख्यालय प्रतापगढ़ (परगना ) से पश्चिम में स्थित चंदिकन महारानी धाम से 08 किमी दूर पर दक्षिण की ओर सई नदी के पहले माँ कोटवा महारानी धाम रामनगर-भोजपुर ग्राम के पूर्वी छोर पर विशाल टीले पर स्थित है जो कि सोमवंशी राजपूतों के इतिहास हुआ है। यहां आज भी नजदीक गाँव के सभी श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा के साथ माँ के मंदिर में आते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धा पूर्वक मानी गई मुरादें माँ जरुर पूरी करती हैं सारे गाँव के कोई भी शुभ काम बिना माँ के मंदिर में दर्शन किए नहीं प्रारम्भ होते हैं। इस मंदिर में यंहा के क्षेत्रिय लोगो की काफी आस्था जुडी हुई है।

प्रतापगढ़ के अन्य दर्शनीय स्थल

जिले में जिला मुख्यालय से 35 किमी डेरवा बाजार से रामपुर खास सम्पर्क मार्ग 2 किमी० पर कचनार वीर बाबा मंदिर स्थित है, स्वरूपपुर (गौरा) का सूर्य मंदिर देउमनाथ धाम, धरमपुर का गायत्री धाम, , शक्तीधाम, नायर देवी धाम, हैंसी का खंडेश्वरनाथ धाम शाह बाबा मजार इत्यादि प्रतापगढ़ जनपद के अन्य दर्शनीय स्थलो में प्रमुख है। इसी तरह चौक घंटाघर से दो किमी पर सई नदी पर खीरीवीर पुल के साथ पूर्वी किनारे पर बाबा खीरीबीर के नाम से एक प्रसिद्ध मन्दिर है । जहाँ पर कई राज्यों से लोग दर्शन को आते हैं इन्हें अपना कुल देवता मानते ।न्दिर है । जहाँ पर कई राज्यों से लोग दर्शन को आते हैं इन्हें अपना कुल देवता मानते ।

प्रतापगढ़ साहित्य दर्शन 

साहित्यिक दृष्टि से बेल्हा अत्यंत समृद्ध रहा है। रीतिकाल में इसी जनपद कवि और आचार्य भिखारीदास का जन्म प्रतापगढ़ के निकट टेंउगा नामक स्थान में सन् 1721 ई० में हुआ था। जो अपने कवित्व शक्ति की बदौलत प्रसिद्धि हासिल की। उनकी कविताएं आज भी क्षेत्र में गूंजती हैं। इन्होंने कई ग्रंथों की रचना की जिसको प्रमाणिक ढंग से प्रकाशित किया गया है। इन पर शोध भी किये जा चुके हैं। आचार्य भिखारीदास ने अपने सभी ग्रंथों को राजा हिन्दूपति सिंह को समर्पित किया था। भिखारीदास द्वारा लिखित सात कृतियाँ प्रामाणिक मानी गईं हैं- रस सारांश, काव्य निर्णय, शृंगार निर्णय, छन्दोर्णव पिंगल, अमरकोश या शब्दनाम प्रकाश, विष्णु पुराण भाषा और सतरंज शासिका हैं।

रससारांश संवत – रससारांश 1799

छंदार्णव पिंगल – छंदार्णव पिंगल संवत 179

काव्यनिर्णय – काव्यनिर्णय संवत 1803

श्रृंगार निर्णय – श्रृंगारनिर्णय संवत 1807

नामप्रकाश कोश – नामप्रकाश कोश संवत 1795

विष्णुपुराण भाषा – विष्णुपुराण भाषा दोहे चौपाई में

छंद प्रकाश,

शतरंजशतिका,

अमरप्रकाश -संस्कृत अमरकोष भाषा पद्य में

हरिवश राय बच्चन

हरिवश राय बच्चन:  हिन्दी के ख्यातिलब्ध राष्ट्रकवी हरिवंश राय बच्चन जी ( 27नवम्बर 1907  – 18  जनवरी 2003) का प्रतापगढ़ का हिंदी साहित्य से एक घनिष्ट संबन्ध रहा है। हिन्दी कविता के उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों मे से एक हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति मधुशाला है। भारतीय फिल्म उद्योग के प्रख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन उनके सुपुत्र हैं। उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ रहे। अनन्तर राज्य सभा के मनोनीत सदस्य। हरिवंश राय बच्चन जी की गिनती हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में होती है।

सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत: प्रकिति के सुकुमार सुमित्रानंदन पंत ( 20 मई 1900 – 28 दिसम्बर 1977) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। जिले के कालाकांकर रियासत में प्रसिद्ध।

छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने दस वर्ष रहकर कई साहित्य पुस्तको की रचना की। पंत जी की निवासस्थान “नक्षत्र” व (पंत जी की कुटी) आज भी जिले में मौजूद है।  झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने।

आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’

आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’:  आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ (जन्म: 13  जुलाई 1935  प्रतापगढ़) अवधी भाषा के प्रख्यात साहित्यकार व कवि थेे। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में मल्हूपुर गाँव में हुआ था। “माटी अउर महतारी” इनकी अवधी कविताओ का संग्रह हैं। ‘अवधी सम्राट’ कहे जाने वाले उन्मत्त की रचनाएं अवध विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती हैं।

 इम्तियाजुद्दीन खान

 इम्तियाजुद्दीन खान: साहित्य के साथ ही कौमी एकता के क्षेत्र में प्रतापगढ़ को पहचान दिलाने वाले 84 वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार इम्तियाजुद्दीन खान उर्दू अदब और साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक सद्भाव की वकालत करने वाले जिम्मेनागरिक के रूप में भी थी। कवि सम्मेलनों, मुशायरों और उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी के सेमिनारों में वह प्रमुख वक्ता होते थे। 1930 में जन्मे इम्तियाजुद्दीन खान को लोग सम्मान से इम्तियाजुद्दीन साहब कहते थे। उन्होंने बाल्मीकि रामायण का उर्दू में अनुवाद करते हुए मशनवी रामायण की रचना की। उनका प्रतापगढ़ ही नहीं प्रदेश और देश में सम्मान था।

प्रतापगढ़ आर्ट, कलाकृति

प्रतापगढ़ में भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है।अगर यंहा के लोगो को भी अपनी प्रतिभाओ को निखारने का अवसर मिले तो वो भी पुरे देश में अपने जिले का नाम रोशन कर सकते है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के बेल्हा की धरती इस मामले में काफीआगे रही है। जिसने हर क्षेत्र की प्रतिभाओं को जन्म दिया। दिल में अगर कुछ कर दिखाने का जज्बा है तो रास्ते अपने आप खुलते जाते है। राजनीति, साहित्य व कला के क्षेत्र में यहां के लाडलों ने जिले का नाम ऊंचा किया है। वैसे तो प्रतापगढ़ की धरती का रिश्ता पहले से ही फिल्म नगरी मुम्बई से रहा है। अस्सी के दशक में जिले के राम सिंह ने जहां मुम्बई में अपनी जगह बनाकर अपनी कला का लोहा मनवाया है, वहीं वालीबुड के महानायक के रूप में जाने जाने वाले अमिताभ बच्चन का रिश्ता भी बेल्हा की मिट्टी से जुड़ा रहा। यहीं की मिट्टी में उन्होंने बचपन की किलकारियां भरी है। अमिताभ बच्चन व उनकी पत्नी जया बच्चन आज भी इस रिश्ते को मानती है। इस धरती के नौनिहाल फिल्मी दुनिया से अपना रिश्ता मानते हुए अभिनय के क्षेत्र में आगे बढ़ने का ख्वाब देखते रहते है। माया नगरी से मिलने वाला समर्थन यहां के कलाकारों को ताकत दे रहा है। इसी के चलते अभी तक बेल्हा के कई कलाकारों ने जिले का नाम रोशन करते हुए वालीबुड में अपनी पहचान बना चुके है। वर्तमान में अभिनेता अनुपम श्याम ओझा, मधुर कुमार, अमितेष सिंह, अभिनेत्री श्वेता तिवारी व गायक रवि त्रिपाठी,ने अभिनय कला गायन क्षेत्र में प्रतापगढ़ का नाम रोशन किया है|

प्रतापगढ़ संस्कृति, कल्चर, सभ्यता

प्रतापगढ़ में आपको हर तरह के लोग मिल जायेंगे। अमीर, गरीब, अनपढ़, पढ़े-लिखे, किसान, साहित्यकार, अभिनेता, गायक  इत्यादि। जातीय विभिन्ताये  यहाँ पर आपको बहुत देखने को मिल जायेगी। जैसेः- हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख व ईसाई। हिन्दुओं का वर्चस्व प्रतापगढ़ में शुरु से ही रहा है। मुस्लिम तबका भी बेगमवाट नामक जगह पर बहुलता में देखा जा सकता है। जहाँ करीगरों की भरमार है। लोहे की आलमारियों से लेकर बिस्कुट फैक्टरियाँ तक इस जगह पर, आपको गली के किसी न किसी छोर पर मिल जायेंगी। दूसरी तरफ पंजाबी मार्केट, पंजाबियों का गढ़ माना जाता है। कपड़ों के व्यवसाय पर इनका दबदबा आज भी है। कपड़ों की खरीद-फरोख्त के लिये पंजाबी मार्केट सबसे उपयुक्त जगह मानी जाती है। कुछ साल पहले महिलाओं को सड़कों पर उतना नहीं देखा जा सकता था लेकिन आज माहौल काफी बदल चुका है। आधुनिकता की हवा यहाँ भी तेजी से चल निकली है। लड़कियाँ और महिलायें सड़कों पर घूम-घूम कर खरीददारी करती हुई आपको नजर आ जायेंगी। परिधानों में मुख्यता साड़ी, सलवार-सूट की बहुलता देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त लड़कियाँ भिन्न-भिन्न लिबासों में आपको नजर आ सकती है। जिनमें जीन्स -टीशर्ट, लाँग स्कर्ट प्रमुख हैं। कुछ मुस्लिम महिलायें आज भी बुर्के में दिख जाती है। जल्द ही दिल्ली व मुम्बई की तरह यहाँ भी परिधानों में आधुनिक व्यापकता दिखाई पड़ेगी। ढकवा की बर्फी बहुत मसहूर है

प्रतापगढ़ व्यसाय, उद्योग

प्रतापगढ़ परगना मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान व एक मैदानी क्षेत्र है। यह मुख्य रूप से आवंले के लिए प्रसिद्ध है। आँवले से सम्बंधित हर उत्पाद आपको यहाँ पर मिल जायेगा। यहाँ से आँवले की सप्लाई डाबर व पतांजलि जैसी बड़ी-बड़ी कम्पनियों में की जाती है।पूरे हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा आंवला प्रतापगढ़ में पैदा होता है। क्षेत्र में कोई भी आधारभूत उद्योग नहीं है, ट्रैक्टर और आंवले की फैक्ट्री होने के बावजूद इस शहर के लोग रोजगार के लिए तरस रहे हैं। दोनों ही फैक्ट्रियां राजनीति की शिकार होने से बंद हो चुकी हैं। जिसके कारण यह क्षेत्र पूर्ण रूप से पिछड़ा क्षेत्र है, जिसके कारण यहां के स्थानीय लोगों में बेरोजगारी बढ़ रही है और लोगों को रोजगार के लिये अन्य क्षेत्रों में पलायन करना पड़ रहा है

प्रतापगढ़ की नदिया

प्रतापगढ़ में नदिया: गंगा, सई,बकुलाही यहाँ कि प्रमुख नदिया है। लोनी तथा सरकनी नदी जनपद में बहती है। उत्तर-पूर्व में गोमती नदी लगभग 6 किलोमीटर का घेरा बनाते हुये प्रवाहित होती हैं।

प्रतापगढ़ के शैक्षणिक संस्थान

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान- अतरसंड प्रतापगढ़

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज – लालगंज अझारा प्रतापगढ़

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज – सगरा सुंदरपुर प्रतापगढ़

सरस्वती विद्या मन्दिर विज्ञान एवं प्रौघोगिकी महाविधालय लालगंज प्रतापगढ

एम.डी .पी.जी. कॉलेज, इलाहाबाद – फैजाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग, प्रतापगढ़, उ. प्र.

सुरेश चन्द्र मिश्र महाविद्यालय – बेल्हाघाट प्रतापगढ़, उ. प्र.

हेमवती नंदन बहुगुणा पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कालेज – लालगंज

राजकीय पॉलिटेक्निक – सुल्तानपुर रोड, चिलबिला

राजकीय पॉलिटेक्निक – प्रेमधरपट्टी, रानीगंज

अमर जनता इंटर मध्यस्थता कॉलेज –  पूरे वैष्णव कटरा गुलाब सिंह

पी.बी.पी.जी. और इंटर कॉलेज – प्रतापगढ़ सिटी

कृषि विज्ञान केन्द्र, अवधेश्पुरम –  लाला बाजार, कालाकांकर

अष्ट भुजा इण्टर कॉलेज – जेठवारा प्रतापगढ़

श्री गोविन्द देशिक संस्कृत विद्यालय – जेठवारा

अब्दुल कलाम इंटर कॉलेज –  प्रतापगढ़

तिलक इंटर कॉलेज – प्रतापगढ़

पनाउदेवी महाविद्यालय  – दाऊतपुर

के.पी. हिंदू इंटर कालेज – प्रतापगढ़

आर पाल सिंह इंटर कॉलेज – बीरापुर प्रतापगढ़

सीनियर बेसिक बाल विद्या पीथ नगर, छतौना,

भद्रेश्वर इण्टर कॉलेज –  डेरवा

रानी राजेश्वरी इन्टर मिडीएट कॉलेज – दिलीपपुर

विमला एकेडमी बेहटा – पट्टी,प्रतापगढ़

इन्द्राणी इंटरमीडिएट कालेज संग्रामगढ़ – प्रतापगढ़

वैष्णो देवी इंटरमीडिएट कालेज – गोंदही, कुंडा, प्रतापगढ़

वैष्णो देवी प्रशिक्षण महाविद्यालय – गोंदही, कुंडा, प्रतापगढ़

भगवान दीन दूबे इंटर कॉलेज – पहाड़पुर प्रतापगढ़

भगवती दीन मिश्रा इण्टर कॉलेज – तारापुर लक्ष्मीगंज प्रतापगढ़

पंडित शिव शरण पांडे पब्लिक स्कूल – लोकापुर जेठवारा प्रतापगढ़

कृपालु महिला महाविद्यालय – कुंडा प्रतापगढ़

डॉ. ब्रजेश कुमार पाण्डेय शिक्षण संस्थान इंटर कॉलेज सोनपुरा –  ढकवा, प्रतापगढ़ (उ. प्र.)

प्रतापगढ़ के प्रमुख एवं उल्लेखनीय लोग

प्रतापगढ़ साहित्य और विज्ञान

डॉ॰हरिवंशराय बच्चन (राष्ट्रीय कवि व उपन्यसकार)

सुमित्रानंदन पंत (कवि)

बाबा भिखारीदास (कवी)

आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ (कवि व साहित्यकार)

नाज़िश प्रतापगढ़ी

स्वदेश भारती

जुमई खान आज़ाद

दीपक धार

प्रतापगढ़ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं कार्यकर्ता

जवाहरलाल नेहरू बाबा राम चंद्र

बाबा राम चंद्र

लाल प्रताप सिंह

पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय

रूप नाथ सिंह यादव

पंडित जवाहरलाल नेहरू

पंडित मदन मोहन मालवीय

राजाराम किसान

संत और धार्मिक प्रतीक

स्वामी करपात्री

जगतगुरु कृपालु महाराज

डॉ. राम विलास वेदांती

प्रतापगढ़ के राजनेता

पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय

अजीत प्रताप सिंह

राजेश कुमार मिश्रा

दीनानाथ  सेवक (Ex. M.L.A. and Ex. Minister, Government of Uttar Pradesh)

दिनेश सिंह (विदेश मंत्री व लोकसभा सदस्य)

स्वामी करपात्री

बृजेश सिंह

रूप नाथ सिंह यादव

फिरोज गाँधी

राम विलास वेदांती

रघुराज प्रताप सिंह “राजा भैया” (मंत्री व विधायक)

राजकुमारी रत्न सिंह

अक्षय प्रताप सिंह

प्रमोद तिवारी

नागेंद्र सिंह मुन्ना यादव

शयाम चरण गुप्ता

बाबूलाल गौर

अभय प्रताप सिंह

राजा राम पांडेय

राजेंद्र प्रताप सिंह (मोती सिंह )

विनोद सरोज

आराधना मिश्रा

शिवाकांत ओझा

गुलशन यादव

प्रतापगढ़ की बॉलीवुड हस्तियां 

अमिताभ बच्चन

बच्चन परिवार  origins lay in the village of Babupatti in Pratapgarh district

श्वेता तिवारी

अनुपम शयाम ओझा

रवि त्रिपाठी (गायक)

खेल

मनोज तिवारी

उद्योगपति

श्याम चरण गुप्ता

संवैधानिक कार्यालय

बाबूलाल यादव (गौर) नौगीर प्रतापगढ़ ( मध्य प्रदेश )

राजा बजरंग बहादुर सिंह ( हिमाचल प्रदेश )

प्रतापगढ़ के पुरातात्वित स्थल

अजगरा प्रतापगढ़

अजगरा प्रतापगढ़: रानीगंज अजगरा में कई महत्वपूर्ण मध्यपाषाणयुगीन व गुप्तकालीन पुरावशेष प्राप्त है। यहाँ से पाए गए 48 पांडुलिपियाँ व महाभारतकालीन शिलालेख और मूर्तियाँ पुरातत्वविद निर्झर प्रतापगढ़ी द्वारा अजगरा संग्राहालय में संरक्षित है।

सराय नाहरराय प्रतापगढ़

सराय नाहरराय: सराय नाहरराय नामक मध्य पाषाणिक पुरास्थल उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर गोखुर झील के किनारे पर स्थित है। इस पुरास्थल की खोज के.सी.ओझा ने की थी। यह पुरास्थल लगभग 1800 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सराय नाहर राय में कुल 11 मानव समाधियाँ तथा 8 गर्त चूल्हों का उत्खनन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से किया गया था। यहाँ की क़ब्रें (समाधियाँ) आवास क्षेत्र के अन्दर स्थित थीं। क़ब्रें छिछली और अण्डाकार थीं। यहाँ संयुक्त रूप से 2 पुरुषों एवं 2 स्त्रियों को एक साथ दफ़नाये जाने के प्रमाण हमें सराय नाहर राय से मिले हैं। सराय नाहरराय से जो 15 मानव कंकाल मिले हैं, वे ह्रष्ट-पुष्ट तथा सुगठित शरीर वाले मानव समुदाय के प्रतीत होते हैं।

महदहा प्रतापगढ़

महदहा: महदहा नामक मध्य पाषाणिक पुरास्थल उत्तर प्रदेश के जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर है यह अपने इतिहास के लिए भी जाना जाता है। तहसील मुख्यालय से लगभग 5-10 किलोमीटर की दूरी पर महदहा स्थित है। महदहा से गर्त चूल्हे का साक्ष्य मिला है। महदहा से सिलबटटा का साक्ष्य भी मिला है।  चूल्हों से पशुओं की अधजली हड्‌डियां भी मिलती है । इससे लगता है कि इनका उपयोग मास पुनने के लिये किया जाता था । महदहा की खुदाई 1978-80 के बीच की गयी । यहाँ से धो लघु उपकरण के अतिरिक्त आवास एवं शवाधान तथा गर्त चूल्हे होते है । किसी-किसी समाधि में स्त्री पुरुष को साथ-साथ दफनाया गया है । समाधियों से पत्थर रख हड्‌डी के उपकरण भी मिलते हैं । महदहा से सिल-लोहे हथौडे के टुकड़े आदि भी प्राप्त होते हैं । इससे लगता है कि लोग घास के दानों को पीसकर जाने के काम में लाते थे ।

दमदमा प्रतापगढ़

दमदमा: महदहा से पाँच किलोमीटर उत्तर पश्चिम की ओर दमदमा (पट्‌टी तहसील) का पुरास्थल बसा हुआ है । 1982 से 1987 तक यहाँ उत्खनन कार्य किया गया । यहीं से ब्लेड, फलक, ब्यूरिन, छिद्रक, चान्द्रिक आदि बहुत से लघु पाषाणोपकरण मिले हैं जिनका निर्माण क्वार्टजाइट, चर्ट, चाल्सिडनी, एगेट, कार्नेलियन आदि बहुमूल्य पत्थरों से हुआ है ।इलाहावाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष जीतू आर. शर्मा तथा उनके सहयोगियों आर. के. वर्मा एवं वी. डी. मिश्र के द्वारा करवाया गया ।हड्‌डी तथा सींग के उपकरण एवं आभूषण भी मिले हैं । इनके साथ-साथ 41 मानव शवाधान तथा कुछ गर्त्त-चूल्हे प्रकाश में आये है । विभिन्न पशुओं जैसे- भेड़, बकरी, गाय-बैल, भैंस, हाथी, गैंडा, चीतल, वारहसिंहा, सूअर आदि की हड्‌डिया भी प्राप्त होती है । कुछ पक्षियों, मछलियों, कछुए आदि की हड्‌डियाँ भी मिली है । इनसे स्पष्ट है कि इस काल का मनुष्य इन पशुओं का मांसाहार करता था जिसे चूल्हे पर पकाया जाता होगा । सिल-लोढे हथौडे आदि के टुकड़े भी मिलते है । दमदमा के अवशेषों का काल दस हजार से चार हजार ईसा पूर्व के बीच बताया गया है ।

परसुरामपुर प्रतापगढ़

परसुरामपुर: रानीगंज तहसील के परसुरामपुर स्थित चौहर्जन धाम में प्राप्त प्राचीन अवशेषो से कृष्ण लोहित मृदभाण्ड संस्कृति का पता चलता है।

स्वरूपपुर प्रतापगढ़

स्वरूपपुर: मान्धाता विकासखंड के ग्राम सभा गौरा में स्वरूपपुर ग्राम में पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए सर्वेंक्षण में प्राचीन शिलाखंड, बौद्धकालीन अवशेष तथा खंडित मुर्तियाँ प्राप्त हुए हैं, प्राप्त अवशेषो को पुरावशेष एंव बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम 1972 के तहत 28 जनवरी 2011 को पंजीकृत किया गया।

कटरा गुलाब सिंह प्रतापगढ़

कटरा गुलाब सिंह: पांडवकालीन भयहरणनाथ धाम तथा कटरा गुलाब सिंह के निकटवर्ती क्षेत्रों के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष महाभारत कालीन व बौद्ध संस्कृति के प्रतीत होते है। प्राप्त भग्नावशेषो को पंजीकृत कर इलाहाबाद संग्राहालय में संरक्षित रखा है। इस क्षेत्र के दो तीन कि0मी0 परिधि में कम से कम आधे दर्जन से अधिक पुरातात्विक महत्व के स्थान है।

सलेमान पर्वतपुर

सलेमान पर्वतपुर, मंदाह सलिहपुर से पत्थर  औजार प्राप्त हुए है।  इस संस्कृति को वेदो में लगभग 1700  ई०  पू० के  आसपास मन माना है।

प्रतापगढ़ परिवहन

प्रतापगढ़ से आपको निम्न जगह जाने के लिये सुगमता से वाहन उपलब्ध हो सकता है जैसे- इलाहाबाद, सुल्तानपुर, जौनपुर, वाराणसी, रायबरेली, लखनऊ, राजधानी दिल्ली,फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, चित्रकूट, कौशाम्बी, भदोही, गोण्डा, मिर्जापुर, बस्ती, बहराईच, गोरखपुर इत्यादि|

प्रतापगढ़ जिले में मुख्य रूप से रिक्शा, टैम्पो, साईकिल, मोटरसाईकिल, बस, ट्रक इत्यादि प्रमुख वाहन हैं। स्थानीय लोगों को एक जगह से दूसरे जगह तक जाने के लिये मानव चलित रिक्शा व टैम्पो, टाटा मैजिक हर चौराहे, नुक्कड़ और गली-मुहल्ले में मिल जाते हैं। गाँव-गाँव में पक्की सड़कों का निर्माण हो चुका है जिससे वाहन की व्यवस्था और आने-जाने की सुगमता, पहले से काफी बेहतर हो चुकी है। छोटा-मोटा सामान ढोने के लिये महिंद्रा पिकअप व छोटा हाथी के साथ ट्रेक्टर ट्राली, मिनीट्रक वाले भी जगह-जगह उपलब्ध हैं। एक जिले से दूसरे जिले तक जाने के लिये सरकारी बस व प्राइवेट बस कम खर्चीले साधन साबित होते हैं। स्थानीय लोग इन्हीं का इस्तेमाल प्रचुरता में करते हैं। लोकल ट्रेनों का भी प्रयोग काफी होता है।

प्रयागराज फैजाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग -96

लखनऊ वाराणसी राजमार्ग -31

देल्हूपुर रानीगंज पट्टी मार्ग-164/E

गंगा एक्सप्रेसवे

कैसे पहुंचें

वायु मार्ग:

यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा वाराणसी, लखनऊ एयरपोर्ट है।

रेल मार्ग:

प्रतापगढ़ रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन प्रतापगढ़ जंक्शन है।

सड़क मार्ग:

भारत के कई प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग द्वारा प्रतापगढ़ आसानी से पहुंचा जा सकता है।

प्रतापगढ़ के बारे में जानकारी/  प्रश्न और उत्तर 

Q 1. प्रतापगढ़ जिला भारत के किस राज्य का एक जिला है?
Ans – प्रतापगढ़ जिला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है।

Q 2. प्रतापगढ़ जिले का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले का मुख्यालय बेल्हा में स्थित है।

Q 3. प्रतापगढ़ जिला उत्तर प्रदेश के किस हिस्से में स्थित है?
Ans – प्रतापगढ़ जिला उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित है।

Q 4. प्रतापगढ़ जिले का क्षेत्रफल कितना है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले का क्षेत्रफल 3,730 वर्ग किलोमीटर (1,440 वर्ग मील) है।

Q 5. प्रतापगढ़ जिले की जनसँख्या कितनी है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले की अनुमानित जनसँख्या 2024 में 3,718,111 है।

Q 6. प्रतापगढ़ जिले का जनसँख्या घनत्व कितना है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले का जनसँख्या घनत्व195 प्रति वर्ग किलोमीटर है।

Q 7. प्रतापगढ़ जिले का लिंगानुपात कितना है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले का लिंगानुपात 994/1000 है।

Q 8. प्रतापगढ़ जिले की साक्षरता कितनी है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले की साक्षरता 73.1% है।

Q 9. प्रतापगढ़ जिले में विधानसभा सदस्य संख्या कितनी है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले में विधानसभा सदस्य संख्या 5 है।

Q 10. प्रतापगढ़ जिले में लोकसभा सदस्य संख्या कितनी है?
Ans – प्रतापगढ़ जिले में लोकसभा सदस्य संख्या 2 है।

प्रतापगढ़ का राजनितिक इतिहास क्या है?

प्रतापगढ़ जिले का निर्माण कैसे और किसने की थी?

प्रतापगढ़ का नाम कैसे पड़ा?

प्रतापगढ़ क्यों प्रसिद्ध है?

प्रतापगढ़ जनपद की स्थापना कब हुई?

भक्ति धाम मनगढ़ कहाँ है?

भक्तिधाम मानगढ़ की स्थापना किसने की थी ?

प्रतापगढ़ का पौराणिक इतिहास क्या है?

प्रतापगढ़ का वैदिक इतिहास क्या है?

प्रतापगढ़ में कितनी नदियां हैं?

प्रतापगढ़ की पुरातत्व धरोहर क्या है?

देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रतापगढ़ का क्या योगदान है?

विश्व में आंवला की खेती सबसे अधिक कहाँ होती है?

विश्व में आंवला की खेती सबसे अधिक प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में होती है।

Pratapgarh Ki Katha

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